मंगूराम ने समाज में फैली कुरीतियों के खिलाफ संघर्ष किया : डॉ. प्रदीप सिंह देव
क्रांतिकारी मंगूराम की पुण्यतिथि

देवघर। मंगूराम मुग्गोवालिया भारतीय समाज सुधार और दलित चेतना के इतिहास में एक अत्यंत महत्वपूर्ण नाम हैं। मंगूराम का निधन 22 अप्रैल 1980 को हुआ, लेकिन उनके विचार और कार्य आज भी जीवित हैं। मौके पर स्थानीय विवेकानंद शैक्षणिक, सांस्कृतिक एवं क्रीड़ा संस्थान के केंद्रीय अध्यक्ष डॉ. प्रदीप कुमार सिंह देव ने उन्हें श्रद्धांजलि अर्पित करते हुए कहा- मंगूराम का जन्म 14 जनवरी 1886 को पंजाब के होशियारपुर ज़िले के मुग्गोवाल गाँव में हुआ था। वे न केवल एक क्रांतिकारी स्वतंत्रता सेनानी थे, बल्कि दलित समाज के उत्थान और सामाजिक समानता के लिए समर्पित महान नेता भी थे। उनका जन्म एक साधारण परिवार में हुआ था। बचपन से ही उन्होंने समाज में व्याप्त जातिगत भेदभाव और असमानता को देखा। इन परिस्थितियों ने उनके मन में सामाजिक परिवर्तन की भावना को जन्म दिया। वे शिक्षा के प्रति जागरूक थे और उन्होंने अपने अनुभवों से यह समझा कि समाज में बराबरी लाने के लिए संघर्ष आवश्यक है। उनका जीवन उस समय निर्णायक मोड़ पर आया जब वे विदेश गए और गदर पार्टी से जुड़े।
गदर पार्टी का उद्देश्य भारत को ब्रिटिश शासन से मुक्त कराना था। अमेरिका में रहते हुए उन्होंने क्रांतिकारी गतिविधियों में सक्रिय भाग लिया और भारतीय स्वतंत्रता के लिए कार्य किया। वे गदर आंदोलन के प्रमुख कार्यकर्ताओं में से एक थे। इस आंदोलन ने भारत में स्वतंत्रता की चेतना को मजबूत किया। भारत लौटने के बाद मंगूराम ने यह महसूस किया कि केवल राजनीतिक स्वतंत्रता पर्याप्त नहीं है, बल्कि सामाजिक समानता भी उतनी ही आवश्यक है। उन्होंने अपना ध्यान दलित समाज के उत्थान की ओर केंद्रित किया। उस समय समाज में छुआछूत और जातिगत भेदभाव बहुत गहरा था। मंगूराम ने इसके खिलाफ आवाज़ उठाई और दलितों को उनके अधिकारों के प्रति जागरूक किया। उनका सबसे बड़ा योगदान आदि धर्म आंदोलन की स्थापना है। 1920 के दशक में उन्होंने इस आंदोलन की शुरुआत की, जिसका उद्देश्य दलितों को एक नई पहचान और सम्मान दिलाना था। इस आंदोलन के माध्यम से उन्होंने यह संदेश दिया कि दलित समाज किसी से कम नहीं है और उन्हें अपने अधिकारों के लिए संगठित होना चाहिए।
उन्होंने दलितों को ‘आदि धर्म’ के रूप में अपनी अलग पहचान अपनाने के लिए प्रेरित किया। उन्होंने समाज में फैली कुरीतियों के खिलाफ संघर्ष किया। उन्होंने शिक्षा, स्वाभिमान और एकता पर जोर दिया। उनके प्रयासों से दलित समाज में आत्मविश्वास बढ़ा और वे अपने अधिकारों के लिए खड़े होने लगे। उन्होंने लोगों को यह सिखाया कि वे अपने अधिकारों के लिए संघर्ष करें और किसी भी प्रकार के अन्याय को स्वीकार न करें। उनके आंदोलन का प्रभाव इतना व्यापक था कि 1931 की जनगणना में पंजाब के लाखों लोगों ने स्वयं को ‘आदि धर्म’ के रूप में दर्ज कराया। यह उनके प्रयासों का परिणाम था कि दलित समाज को एक नई पहचान और सम्मान मिला। उनके कार्यों ने भारतीय समाज में समानता और न्याय की दिशा में महत्वपूर्ण बदलाव लाए। उनका जीवन हमें यह सिखाता है कि सामाजिक परिवर्तन के लिए साहस, धैर्य और समर्पण की आवश्यकता होती है। वे एक ऐसे महान समाज सुधारक थे जिन्होंने अपने जीवन को समाज के सबसे कमजोर वर्ग के उत्थान के लिए समर्पित कर दिया। उन्होंने न केवल स्वतंत्रता संग्राम में योगदान दिया, बल्कि सामाजिक समानता के लिए भी संघर्ष किया। उनका ‘आदि धर्म आंदोलन’ दलित चेतना का एक महत्वपूर्ण अध्याय है। आज भी उनका जीवन और संघर्ष हमें प्रेरणा देता है कि हम एक समान और न्यायपूर्ण समाज के निर्माण के लिए कार्य करें। इस प्रकार, मंगूराम का योगदान भारतीय इतिहास में अत्यंत महत्वपूर्ण और प्रेरणादायक है।



