आज की मुन्नी कल की माता – मानव जाति की है निर्माता

– मो० मोअज़्ज़म आरिफ

                  भारत में बालिकाओं को वैदिक काल में सुख-शांति और धैर्य का प्रतीक माना गाया। समाज में इनका स्थान श्रेष्ठ था इन्हें पूजनीय आदरणीय सम्माननीय समझा जाता था। धनी, कुलीन और राजसी परिवारों में बालिकाओं के सर्वांगीन विकास पर ध्यान दिया जाता था। धार्मिक अनुष्ठान में भाग लेने शास्त्रों का अध्ययन करने और ऋषि मुनियों का दर्जा प्राप्त था। वे सभाओं में भाग लेती थीं और अपना पति स्वयंवर के माध्यम से चुनने की स्वतंत्रता रखती थीं। स्त्री को पुरुष की अर्धांगिनी अर्थात आधा अंग कहा गया है। गार्गी, मैत्रेयी जैसी ज्ञानी बालिकाओं का उल्लेख मिलता है। बाल विवाह नहीं होते थे और विधवा पुनर्विवाह की प्रथा थी। सती प्रथा प्रचलित नहीं थी।आर्थिक रूप से उन्हें स्त्रीधन पर अधिकार था और संपत्ति का अधिकार भी मिलता था। इन्हें साहित्यिक शिक्षा अच्छी दी जाती थी।

इस्लाम धर्म में बालिकाओं को सम्मान सुरक्षा और अधिकार प्रदान किए गए हैं। क़ुरआन और हदीस के अनुसार स्त्री और पुरुष दोनों ईश्वर की दृष्टि में समान हैं और दोनों को समान मानवीय गरिमा प्राप्त है। इस्लाम ने ऐसे समय में बालिकाओं को अधिकार दिए जब समाज में उन्हें बहुत कम सम्मान प्राप्त था। इस्लाम में बालिकाओं को सबसे पहले जीवन का अधिकार दिया गया। इस्लाम से पहले कन्या भ्रूण हत्या प्रचलित थी जिसे इस्लाम ने सख़्ती से निषिद्ध किया। क़ुरआन में बालिकाओं की हत्या को गंभीर अपराध बताया गया है। बालिकाओं को शिक्षा का अधिकार भी इस्लाम में समान रूप से प्राप्त है। पैग़म्बर मुहम्मद (सल्ल.) ने कहा कि ज्ञान प्राप्त करना हर पुरुष और स्त्री के लिए अनिवार्य है। इस्लाम में शिक्षित बालिकाओं को समाज और परिवार की मजबूती का आधार माना गया है। इस्लाम बालिकाओं को आर्थिक अधिकार प्रदान करता है। बालिकाओं को संपत्ति में उत्तराधिकार का अधिकार है। वह अपनी कमाई संपत्ति और धन की स्वामिनी होती है और उस पर किसी अन्य का अधिकार नहीं होता। विवाह के समय उसे मेहर दिया जाता है जो उसका व्यक्तिगत अधिकार है। इस्लाम में बालिकाओं को विवाह और तलाक़ से जुड़े अधिकार भी दिए गए हैं। बालिकाओं की सहमति के बिना विवाह अमान्य माना गया है। उसे तलाक़ के बाद सम्मानजनक जीवन भरण-पोषण और सुरक्षा का अधिकार प्राप्त है। बालिकाओं को सम्मान और सुरक्षा का अधिकार इस्लाम की महत्वपूर्ण विशेषता है। माँ को इस्लाम में अत्यंत ऊँचा स्थान दिया गया है। कहा गया है कि “जन्नत माँ के क़दमों तले है।” बेटी, बहन और पत्नी के रूप में भी बालिकाओं को सम्मान देने का निर्देश दिया गया है। इस्लाम में बालिकाओं की दैनिय स्थिति में गुणात्मक सुधार देखने को मिला। ईसाई धर्म में भी महिलाओं को प्रेम, करुणा और समानता का संदेश दिया गया है। बाइबिल में नारी को परिवार और समाज की आधारशिला माना गया है। सिख धर्म में गुरु नानक देव जी ने स्पष्ट कहा कि नारी के बिना संसार की कल्पना संभव नहीं है और उन्होंने स्त्री-पुरुष समानता पर जोर दिया। बौद्ध और जैन धर्मों में भी महिलाओं को आत्मिक उन्नति और सम्मान का अधिकार प्राप्त है।

मध्य काल में जहांआरा, नूरजहां, रजिया सुल्ताना जैसी सशक्त स्त्रियों का उल्लेख मिलता है। आधुनिक भारत में महिलाएं राष्ट्रपति, प्रधानमंत्री, लोक सभा अध्यक्ष, प्रतिपक्ष की नेता आदि जैसे शीर्ष पदों पर आसीन हुई हैं। भारत का संविधान महिलाओं को समानता का अधिकार, शिक्षा का अधिकार, अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता और गरिमापूर्ण जीवन का अधिकार प्रदान करता है। बालिकाओं को और अधिक सशक्त एवं सुरक्षा प्रदान करने के लिए बाल विवाह निषेध अधिनियम- 2006 यौन अपराधों से बच्चों का संरक्षण (पॉक्सो) अधिनियम 2012 बाल दुर्व्यवहार को को समाप्त किया गया। किशोर न्याय अधिनियम 2015 द्वारा जरूरतमंद बच्चों की देखभाल और सुरक्षा दिया गया। मिशन वात्सल्य, लापता बच्चों की सहायता के लिए चाइल्ड हेल्पलाइन और ट्रैक चाइल्ड पोर्टल जैसी सेवाओं के साथ बाल विकास और सुरक्षा पर केंद्रित की गई। ट्रैक चाइल्ड द्वारा पुलिस स्टेशनों में रिपोर्ट किए गए ‘लापता’ बच्चों का मिलान, उन ‘पाए गए’ बच्चों के साथ करने की सुविधा प्रदान की गई जो बाल देखभाल संस्थानों में रह रहे हैं। पीएम केयर्स फॉर चिल्ड्रन योजना कोविड-19 के कारण अनाथ हुए बच्चों की मदद करती है। इसके अलावा, एनआईएमएचएएनएस और ई-संपर्क कार्यक्रम के सहयोग से मानसिक स्वास्थ्य और चिकित्सा देखभाल भी प्रदान की जाती है। कुल मिलाकर ये सभी प्रयास एक साथ मिलकर भारत में बालिकाओं के अधिकारों और कल्याण पर ज़ोर देते हुए एक सुरक्षित वातावरण को बढ़ावा देते हैं। सरकारी एवं गैर सरकारी अनेक संस्थाएं महिलाओं के उत्थान के क्षेत्र में कार्य कर रही है। सफीनह संस्था बिना किसी सरकारी सहायता से असहाय नि:सहाय निर्धन निम्न वर्ग विकलांग फुटपाथ एवं नालों के किनारे जिंदगी गुज़र बसर करने वाली बालिकाओं को पूर्ण आवासीय सुरक्षा प्रदान कर पठन-पाठन से लैस करके समाज में उच्च स्थान तक पहुंचने का असाधारण कार्य कर चुकी है। इस प्रशंसनीय कार्य के लिए संस्था की सचिव श्रीमती महजबी सरवर को भारत सरकार ने रानी लक्ष्मी बाई स्त्री शक्ति पुरस्कार से सम्मानित किया। इनके जैसे अनेक लोग बालिकाओं के उत्थान में लगे हुए हैं।

एक दौर ऐसा आया कि बालिकाओं का कम उम्र में विवाह से बालिका शिक्षा को बुरी तरह प्रभावित किया। वे शिक्षा से वंचित होने लगीं और पुरुषों पर निर्भर हो गईं। बाल विवाह की प्रथा शुरू हुई और विधवाओं की स्थिति खराब हुई। उन्हें धन और सुरक्षा के लिए पुरुषों पर आश्रित रहना पड़ा। बालिकाओं से संबंधित समाज में अनेक कुप्रथाओं ने जन्म ले लिया। बालिकाओं को भेदभाव, अशिक्षा, बाल विवाह, दहेज प्रथा और हिंसा जैसी समस्याओं का सामना करना पड़ता है। यह स्थिति किसी एक धर्म की नहीं, बल्कि सामाजिक सोच और रूढ़िवादी मानसिकता की देन है। इसके निदान के लिए सावित्रीबाई फुले ज्योतिबा फुले फातिमा शेख राजा राम मोहन रॉय आदि ने असाधारण कार्य किया। बालिकाओं को समग्र विकास सुनिश्चित करना न सिर्फ उनकी व्यक्तिगत भलाई के लिए बल्कि समाज की सामूहिक उन्नति के लिए भी ज़रुरी है। न्यायसंगत भविष्य के निर्माण के लिए लड़कियों के अधिकारों और अवसरों को पहचानना तथा उनका समर्थन करना बेहद ज़रुरी है। राष्ट्रीय बालिका दिवस हमें यह अवसर प्रदान करता है कि हम समाज में बालिकाओं की स्थिति उनके अधिकारों तथा उनके समक्ष उपस्थित चुनौतियों पर गंभीरता से विचार करें। सरकार द्वारा ‘बेटी बचाओ बेटी पढ़ाओ’, ‘सुकन्या समृद्धि योजना’ और महिलाओं की सुरक्षा से जुड़ी अनेक योजनाएँ चलाई जा रही हैं जो बालिकाओं की स्थिति को सशक्त बनाने की दिशा में महत्वपूर्ण कदम हैं।

बिहार सरकार ने महिलाओं के सामाजिक, आर्थिक और शैक्षणिक सशक्तिकरण के लिए अनेक महत्वपूर्ण अधिकार, आरक्षण और योजनाएँ लागू की हैं। इनका उद्देश्य महिलाओं को समान अवसर प्रदान करना और उन्हें आत्मनिर्भर बनाना है। सरकारी नौकरियों में महिलाओं को 35% आरक्षण  प्रशासन, शिक्षा, स्वास्थ्य और पुलिस जैसी सेवाओं में महिलाओं की भागीदारी बढ़ानी है। बिहार देश का पहला राज्य है जहाँ पंचायती राज संस्थाओं और नगर निकायों में महिलाओं को 50% आरक्षण दिया गया। इससे ग्राम पंचायत, पंचायत समिति, जिला परिषद और नगर निकायों में महिलाओं का नेतृत्व सशक्त हुआ है। बिहार पुलिस में महिलाओं की भर्ती को बढ़ावा देने के लिए विशेष प्रावधान किए गए हैं। महिला आरक्षियों की नियुक्ति में आरक्षण और सुविधाएँ देकर सुरक्षा व्यवस्था में महिलाओं की भूमिका को मजबूत किया गया है। बिहार सरकार ने बालिकाओं की शिक्षा को बढ़ावा देने के लिए मुख्यमंत्री कन्या उत्थान योजना, साइकिल योजना, पोशाक योजना, नैपकिन योजना, मैट्रिक इंटर स्नातक पास बालिकाओं को आगे की शिक्षा पूर्ण करने के लिए एकमुश्त प्रोत्सहन उपलब्ध कराना। बालिका के स्वावलंबन के लिए जीविका योजना के अंतर्गत स्वयं सहायता समूहों को ऋण, प्रशिक्षण और रोजगार के अवसर प्रदान किए जाते हैं। इससे ग्रामीण बालिकाओं की आय में वृद्धि हुई है। बालिकाओं की सुरक्षा के लिए राज्य में महिला हेल्पलाइन, फास्ट ट्रैक अदालतें और महिला थाना जैसी व्यवस्थाएँ की गई हैं जिससे महिलाओं को त्वरित न्याय और संरक्षण मिल सके।

राष्ट्रीय बालिका दिवस हमें यह संदेश देता है कि सभी धर्मों की मूल शिक्षाओं को समझते हुए हमें बालिकाओं को शिक्षा, सुरक्षा और समान अवसर प्रदान करने होंगे। जब समाज में हर बालिका अपने अधिकारों के प्रति जागरूक होगी और उसे आगे बढ़ने का अवसर मिलेगा तभी सच्चे अर्थों में एक समतामूलक और सशक्त समाज का निर्माण संभव होगा। हमारा सामूहिक दायित्व है कि हम धर्म, जाति लिंग और वर्ग से ऊपर उठकर बालिकाओं के सम्मान, अधिकार और सशक्तिकरण के लिए निरंतर प्रयास करें। कार्यक्रम के आयोजन मात्र से बालिकाओं का उत्थान नहीं होगा इसके लिए हम लोगों को सच्चे दिल से बालिकाओं के प्रति आदर श्रद्धा करुणा रखना होगा। 24 जनवरी को हर साल राष्ट्रीय बालिका दिवस भारत में मनाया जाता है। महिला एवं बाल विकास भारत सरकार ने इसकी शुरुआत 2008 में की थी। इस दिन विभिन्न कार्यक्रमों का आयोजन कर सेव द गर्ल चाइल्ड, चाइल्ड सेक्स रेशियो और बालिकाओ के लिए स्वास्थ्य और सुरक्षित वातावरण बनाया जाता है। लड़कियों का समग्र विकास सुनिश्चित करना, न सिर्फ उनकी व्यक्तिगत भलाई के लिए, बल्कि समाज की सामूहिक उन्नति के लिए भी ज़रुरी है। खासकर एक अधिक न्यायसंगत भविष्य के निर्माण के लिए, बालिकाओं के अधिकारों और अवसरों को पहचानना तथा उनका समर्थन करना बेहद ज़रुरी है।

 

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