पंडित रवि शंकर जयंती तथा जानकी वल्लभ शास्त्री की पुण्यतिथि
पंडित रवि शंकर तथा जानकी वल्लभ शास्त्री आज भी अमर हैं हमारे दिल में : डॉ. प्रदीप सिंह देव

देवघर। पंडित रवि शंकर जयंती तथा जानकी वल्लभ शास्त्री भारतीय सांस्कृतिक जगत के दो ऐसे महान व्यक्तित्व हैं जिन्होंने संगीत और साहित्य के क्षेत्र में अमिट छाप छोड़ी। दोनों ही अपने-अपने क्षेत्र में अंतरराष्ट्रीय ख्याति प्राप्त कर भारत की समृद्ध परंपरा को विश्व पटल पर स्थापित करने में सफल रहे। मौके पर स्थानीय विवेकानंद शैक्षणिक, सांस्कृतिक एवं क्रीड़ा संस्थान के केंद्रीय अध्यक्ष डॉ. प्रदीप कुमार सिंह देव ने दोनों महान विभूतियों को श्रद्धांजलि अर्पित करते हुए कहा- पंडित रवि शंकर का जन्म 7 अप्रैल 1920 को वाराणसी में हुआ। वे बचपन से ही कला के वातावरण में पले-बढ़े। उनके बड़े भाई उदय शंकर प्रसिद्ध नर्तक थे, जिनके साथ रवि शंकर ने प्रारंभिक दिनों में विदेश यात्राएँ कीं। बाद में उन्होंने महान संगीतज्ञ उस्ताद अलाउद्दीन खाँ से सितार की शिक्षा ग्रहण की और संगीत साधना में पूर्णतः समर्पित हो गए। रवि शंकर ने भारतीय शास्त्रीय संगीत, विशेष रूप से सितार वादन, को वैश्विक पहचान दिलाई।
उन्होंने पश्चिमी देशों में अनेक कार्यक्रम प्रस्तुत किए और भारतीय संगीत की गहराई, रागों की विविधता तथा आध्यात्मिकता से विश्व को परिचित कराया। वे पहले भारतीय संगीतकारों में से थे जिन्होंने अंतरराष्ट्रीय मंचों पर भारतीय संगीत को लोकप्रिय बनाया। उनका सहयोग प्रसिद्ध पश्चिमी कलाकारों के साथ भी रहा, जैसे जॉर्ज हर्रिसन, जिसके माध्यम से उन्होंने भारतीय संगीत को नई पीढ़ी तक पहुँचाया। उन्हें कई प्रतिष्ठित पुरस्कारों से सम्मानित किया गया, जिनमें भारत रत्न, पद्म विभूषण और ग्रैमी अवार्ड शामिल हैं। उनका योगदान केवल एक कलाकार तक सीमित नहीं था, बल्कि वे एक सांस्कृतिक दूत भी थे। उन्होंने भारतीय संगीत की शिक्षा के लिए संस्थानों की स्थापना की और अनेक शिष्यों को प्रशिक्षित किया। उनकी शैली में परंपरा और नवाचार का सुंदर संतुलन देखने को मिलता है, जिसने भारतीय संगीत को नई दिशा दी। डॉ. देव ने आगे जानकी जी के बारे में कहा- जानकी वल्लभ शास्त्री की मृत्यु 7 अप्रैल, 2011 को हुई थी जबकि उनका जन्म 5 जनवरी 1916 को बिहार में हुआ। वे हिंदी और संस्कृत के विद्वान, कवि, निबंधकार और साहित्यकार थे।
प्रारंभ से ही उन्हें साहित्य और भाषा के प्रति गहरा लगाव था। उन्होंने संस्कृत में गहन अध्ययन किया और बाद में हिंदी साहित्य में अपनी विशिष्ट पहचान बनाई। उनकी रचनाओं में संवेदना, प्रकृति-चित्रण, दर्शन और मानवीय भावनाओं का अद्भुत समन्वय मिलता है। उनकी भाषा अत्यंत सरल, मधुर और प्रभावशाली है, जो पाठकों के हृदय को स्पर्श करती है। वे छायावाद के प्रभाव में रहे, परंतु उनकी रचनाओं में मौलिकता स्पष्ट रूप से दिखाई देती है। उनकी प्रमुख कृतियों में काव्य, गीत, निबंध और अनुवाद शामिल हैं। उन्होंने संस्कृत और हिंदी साहित्य के बीच एक सेतु का कार्य किया और दोनों भाषाओं की समृद्धि को बढ़ावा दिया। साहित्य के क्षेत्र में उनके योगदान के लिए उन्हें पद्मश्री सहित कई सम्मान प्राप्त हुए। वे केवल एक कवि ही नहीं, बल्कि एक चिंतक और दार्शनिक भी थे। उनकी रचनाएँ समाज, संस्कृति और मानवीय मूल्यों पर गहन विचार प्रस्तुत करती हैं। उन्होंने भारतीय परंपरा, संस्कृति और आध्यात्मिकता को अपने साहित्य के माध्यम से जीवंत बनाए रखा।
पंडित रवि शंकर और जानकी वल्लभ शास्त्री दोनों ही अपने-अपने क्षेत्र के अद्वितीय व्यक्तित्व थे। एक ने संगीत के माध्यम से भारत की सांस्कृतिक धरोहर को विश्वभर में फैलाया, तो दूसरे ने साहित्य के माध्यम से मानवीय संवेदनाओं और भारतीय संस्कृति को अभिव्यक्ति दी। इन दोनों महान विभूतियों का जीवन हमें यह सिखाता है कि समर्पण, साधना और रचनात्मकता के माध्यम से व्यक्ति अपने क्षेत्र में उत्कृष्टता प्राप्त कर सकता है और समाज को नई दिशा दे सकता है।



