अपने अधिकारों के लिए एकजुट होकर संघर्ष करेगा आदिवासी समाज : हेमंत

रांची। झारखंड के मुख्यमंत्री हेमंत सोरेन असम विधानसभा चुनाव प्रचार में लगातार हिमंता बिस्वा शर्मा को चुनौती दे रहे हैं। चुनाव प्रचार के दूसरे दिन झारखंड के मुख्यमंत्री एवं झारखंड मुक्ति मोर्चा के केंद्रीय अध्यक्ष हेमंत सोरेन ने डिब्रुगढ़ जिले के तिंगखोंग और सोनारी विधानसभा क्षेत्रों में पार्टी प्रत्याशियों महावीर बासके और बलदेव तेली के समर्थन में विशाल जनसभाओं को संबोधित किया। अपने भाषण में उन्होंने चाय बागान श्रमिकों और आदिवासी समुदाय के मुद्दों को प्रमुखता से उठाते हुए राज्य की मौजूदा व्यवस्था पर तीखा प्रहार किया। अपने संबोधन में हेमंत सोरेन ने आदिवासी समुदाय के साथ हो रहे शोषण का मुद्दा भी उठाया।
उन्होंने आरोप लगाया कि सत्ता में बैठी सरकारें चुनाव के समय आदिवासियों का समर्थन लेती हैं लेकिन बाद में उन्हें उनके हाल पर छोड़ देती हैं। उन्होंने कहा कि अब समय परिवर्तन का है। आदिवासी समाज अपने अधिकारों के लिए एकजुट होकर संघर्ष करेगा। झारखंड के गठन के संघर्ष का जिक्र करते हुए उन्होंने कहा कि जैसे वहां के पूर्वजों ने आंदोलन कर राज्य हासिल किया, उसी तरह असम में भी अधिकारों के लिए संघर्ष जरूरी है। यह समुदाय कमजोर नहीं है। आदिवासी सत्ता बनाना भी जानते हैं और जरूरत पड़ने पर सत्ता को बदलना भी जानते हैं। उन्होंने झारखंड के शहीदों को नमन करते हुए कहा कि पूर्वजों ने अपने अधिकारों की रक्षा के लिए संघर्ष किया था और अब वही परंपरा आगे बढ़ाने का समय है। उन्होंने चाय बागान और आदिवासी समुदाय से एकजुट होकर अपने अधिकारों के लिए आवाज उठाने की अपील की।
श्री सोरेन ने कहा कि असम का चाय बागान समुदाय पिछले लगभग 200 वर्षों से राज्य की अर्थव्यवस्था की रीढ़ रहा है लेकिन आज भी यह समुदाय बुनियादी अधिकारों से वंचित है। उन्होंने मजदूरी का मुद्दा उठाते हुए कहा कि असम में चाय बागान श्रमिकों को करीब 250 रुपये प्रतिदिन मिलते हैं जबकि अन्य राज्यों, जैसे कर्नाटक में यह लगभग 600 रुपये तक है। उन्होंने आरोप लगाया कि श्रमिकों को भूमि अधिकार, सम्मानजनक आवास, गुणवत्तापूर्ण शिक्षा और स्वास्थ्य जैसी बुनियादी सुविधाएं भी उपलब्ध नहीं कराई गई हैं। राजनीतिक दलों ने इस समुदाय का वर्षों तक केवल वोट बैंक के रूप में इस्तेमाल किया लेकिन उनके जीवन स्तर में कोई ठोस सुधार नहीं हुआ। विकास का मतलब केवल आंकड़ों तक सीमित नहीं होना चाहिए बल्कि हर घर तक खुशहाली पहुंचना चाहिए। उन्होंने कहा कि झारखंड की तरह असम में भी युवाओं को अवसर, मेहनतकशों को सम्मान और स्थानीय समाज को उनका अधिकार मिलना चाहिए।



