मालती चौधरी भूदान आंदोलन के दौरान विनोबा भावे के साथ थीं : डॉ. प्रदीप सिंह देव

मालती चौधरी की पुण्यतिथि

देवघर। मालती देवी चौधरी भारतीय स्वतंत्रता सेनानी तथा गांधीवादी थीं। सन 1921 में, सोलह साल की उम्र में मालती चौधरी को शांति निकेतन भेजा गया, जहां उन्हें विश्व भारती में भर्ती कराया गया। उनकी मृत्यु 15 मार्च, 1998 को हुई थी। मौके पर स्थानीय विवेकानंद शैक्षणिक, सांस्कृतिक एवं क्रीड़ा संस्थान के केंद्रीय अध्यक्ष डॉ. प्रदीप कुमार सिंह देव ने उन्हें श्रद्धांजलि अर्पित करते हुए कहा- नमक सत्याग्रह के दौरान मालती चौधरी और उनके पति नबाकृष्णा चौधरी भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस में शामिल हो गए और आंदोलन में भाग लिया। उन्होंने सत्याग्रह के लिए अनुकूल वातावरण बनाने के लिए लोगों के साथ संवाद किया। उनका जन्म 26 जुलाई, 1904 में हुआ था। वह एक ब्राह्मण परिवार से थीं। उनकी पृष्ठभूमि अच्छी थी। 16 साल की उम्र में उनको शांति निकेतन भेजा गया, जहां उन्हें टैगोर द्वारा स्थापित ‘विश्वभारती’ में भर्ती कराया गया। वह बहुत भाग्यशाली थीं कि उन्हें शांतिनिकेतन में रवींद्रनाथ टैगोर से सीधे ज्ञान प्राप्त करने का मौका मिला। गुरुदेव ने प्यार से उन्हें ‘मीनू’ कहा करते थे।

1933 में उन्होंने अपने पति के साथ ‘उत्कल कांग्रेस समाजवादी कर्म संघ’ का गठन किया। बाद में इस संगठन को ‘अखिल भारतीय कांग्रेस सोशलिस्ट पार्टी’ की उड़ीसा प्रांतीय शाखा के रूप में जाना जाने लगा। 1934 में वे उड़ीसा में अपनी प्रसिद्ध पदयात्रा में गांधीजी के साथ शामिल हुईं एवं 1946 में उड़ीसा के अंगुल में ‘बाजीरावत छत्रवास’ और 1948 में ‘उत्कल नवजीवन मंडल’ की स्थापना की। बाजीराव छत्रवास का गठन स्वतंत्रता सेनानियों, अनुसूचित जातियों, अनुसूचित जनजातियों, अन्य पिछड़े वर्गों और समाज के विशेषाधिकार प्राप्त वर्गों के बच्चों के बीच शिक्षा का प्रसार करने के लिए किया गया था। उत्कल नवजीवन मंडल ने मुख्य रूप से उड़ीसा में ग्रामीण विकास और आदिवासी कल्याण के लिए काम किया। मालती चौधरी ने चंपतिमुंडा में पोस्ट बेसिक स्कूल की स्थापना भी की। शिक्षा और ग्रामीण क्षेत्र में अपनी महान भूमिका के लिए उन्होंने खुद को एक समर्पित स्वतंत्रता सेनानी के रूप में स्थापित किया। वे भूदान आंदोलन के दौरान विनोबा भावे के साथ थीं।

वह अपनी नोआखली यात्रा के दौरान गांधीजी से जुड़ीं। गांधीजी ने उन्हें प्यार से ‘तूफानी’ कहा। उन्होंने ‘कृषक आंदोलन’ का नेतृत्व किया जिससे गरीब किसानों को भूस्वामियों और साहूकारों की पकड़ से बचाया जा सके। सन 1946 में उन्हें भारत की संविधान सभा के सदस्य के रूप में चुना गया। वह उत्कल प्रदेश कांग्रेस समिति के अध्यक्ष के रूप में भी चुनी गई थी। आजादी के बाद उन्होंने पिछड़े वर्गों के लिए संघर्ष करना जारी रखा। जब उनके पति ने ओडिशा के मुख्यमंत्री के रूप में कार्य किया, तो उन्होंने उड़ीसा में विभिन्न ग्रामीण पुनर्निर्माण योजना शुरू की। जब आपात काल का वादा किया गया था, तब मालती चौधरी ने इंदिरा गांधी सरकार की नीति का विरोध किया। उन्हें जेल में डाल दिया गया था। उन्हें राष्ट्र के प्रति समर्पण के लिए कई पुरस्कार मिले, जिनमें बाल कल्याण के लिए राष्ट्रीय पुरस्कार, जमनालाल बजाज पुरस्कार, उत्कल सेवा सम्मान, टैगोर लिटरेसी अवार्ड, लोकसभा और राज्य सभा द्वारा संविधान सभा की पहली बैठक की 50 वीं वर्षगांठ के अवसर पर सम्मान, राज्य समाज कल्याण सलाहकार बोर्ड द्वारा सम्मान, राज्य महिला आयोग द्वारा सम्मान आदि हैं।

 

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