पी.सी.वैद्य का मानना था कि गणित सिखाना शायद कठिन है, मगर गणित सीखना कठिन नहीं है : डॉ. प्रदीप सिंह देव

- पी. सी. वैद्य की पुण्यतिथि
देवघर। प्रह्लाद चुन्नीलाल वैद्य भारत के उन गिने-चुने गणितज्ञों में से एक रहे, जिन्होंने गणित के क्षेत्र में अन्तर्राष्ट्रीय स्तर पर महत्वपूर्ण व दूरगामी योगदान दिया था। उनकी मृत्यु 12 मार्च, 2010 को हुई थी। मौके पर स्थानीय साइंस एंड मैथमेटिक्स डेवलपमेंट आर्गेनाइजेशन के राष्ट्रीय सचिव डॉ. प्रदीप कुमार सिंह देव ने उन्हें श्रद्धांजलि अर्पित करते हुए कहा- पी.सी. वैद्य न सिर्फ एक मशहूर गणितज्ञ थे बल्कि एक शिक्षाविद भी थे। वे चाहते थे और प्रयास करते थे कि गणित बच्चों के लिए सुगम व रुचिकर बने। वे मानते थे कि गणित सिखाना शायद कठिन है, मगर गणित सीखना कठिन नहीं है क्योंकि गणित तो हमारी संस्कृति का अंग है। उनका जन्म 23 मई, 1918 को गुजरात के जूनागढ़ जिले के शाहपुर में हुआ था।
उनकी प्रारंभिक शिक्षा भावनगर में संपन्न हुई। गणित में विशेष रुचि होने के कारण उन्होंने बम्बई विश्वविद्यालय से अनुप्रयुक्त गणित में विशेषज्ञता के साथ एम.एस.सी. की डिग्री प्राप्त की। वे अपने समय के प्रसिद्ध भौतिकविद और शिक्षाविद विष्णु वासुदेव नार्लीकर से बहुत प्रभावित थे। उस दौर में विष्णु वासुदेव नार्लीकर के साथ कार्य करने वाले शोधार्थियों के समूह की पहचान सापेक्षता केन्द्र के रूप में विख्यात हो चुकी थी। वे भी उनके दिशा-निर्देश में इस क्षेत्र में शोधकार्य करना चाहते थे। इसलिए वह बनारस हिन्दू विश्वविद्यालय गए। वहां उन्होंने विष्णु वासुदेव नार्लीकर के दिशा-निर्देशन में सापेक्षता सिद्धांत पर शोधकार्य शुरू कर दिया तथा ‘वैद्य सॉल्यूशन’ प्रस्तुत किया। इस सिद्धान्त की प्रासंगिकता को मान्यता साठ के दशक में मिली, जब खगोल-विज्ञानियों ने ऊर्जा के घने, मगर शक्तिशाली उत्सर्जकों की खोज की। जैसे ही सापेक्षतावादी खगोल भौतिकी को मान्यता मिली, वैसे ही ‘वैद्य सॉल्यूशन’ को सहज ही अपना स्थान हासिल हो गया और विज्ञान के क्षेत्र में उन्हें ख्याति मिली। वे एक मशहूर गणितज्ञ होने के साथ ही एक शिक्षाविद भी थे।
वह चाहते थे कि गणित बच्चों के लिए सुगम व रुचिकर बने। इसके लिए उन्होंने अनेक प्रयास किए। उनका मानना था कि गणित सिखाना शायद कठिन है, मगर गणित सीखना कठिन नहीं है क्योंकि यह हमारी संस्कृति का अभिन्न अंग रहा है। उन्होंने गुजराती तथा अंग्रेज़ी में विज्ञान और गणित की कई प्रसिद्ध पुस्तकों का लेखन किया, जैसे, ‘अखिल ब्राह्मांडमैन’, जिसका अर्थ है सम्पूर्ण ब्रह्मांड में, तथा ‘व्हाट इज मॉडर्न मैथमेटिक्स’। वर्ष 1947 तक उन्होंने सूरत, राजकोट, मुम्बई आदि जगहों पर गणित के शिक्षक के रूप में कार्य किया। इस दौरान उन्होंने अपनी शिक्षा भी जारी रखी। वर्ष 1948 में उन्होंने बम्बई विश्वविद्यालय से अपनी पी.एच.डी. पूरी कर ली। अपना रिसर्च कार्य उन्होंने नव स्थापित टाटा मूलभूत अनुसंधान संस्थान से किया। उन्हें स्वतंत्रता के बाद भारत में गांधीवादी दर्शन के अनुयायी के रूप में जाना जाता है। वे गांधीजी के विचारों से प्रेरित होकर आजादी के आन्दोलन में भी शामिल रहे। उन्होंने गांधीवादी विचारों को अपनाते हुए खादी का कुर्ता और टोपी को धारण किया। उपकुलपति के पद पर रहते हुए भी सरकारी कार का उपयोग करने से मना कर दिया और विश्वविद्यालय आने-जाने के लिए साइकिल का ही उपयोग करते रहे।



