जानकी वल्लभ शास्त्री का पहला गीत ‘किसने बांसुरी बजाई’ बहुत लोकप्रिय हुआ : डॉ. प्रदीप सिंह देव
जानकी वल्लभ शास्त्री जयंती

देवघर। जानकी वल्लभ शास्त्री प्रसिद्ध कवि थे। उन्हें उत्तर प्रदेश सरकार द्वारा ‘भारत भारती पुरस्कार’ से सम्मानित किया गया था। वे उन थोड़े-से कवियों में रहे, जिन्हें हिंदी कविता के पाठकों से बहुत मान-सम्मान मिला। मौके पर स्थानीय विवेकानंद शैक्षणिक, सांस्कृतिक एवं क्रीड़ा संस्थान के केंद्रीय अध्यक्ष डॉ. प्रदीप कुमार सिंह देव ने उन्हें श्रद्धांजलि अर्पित करते हुए कहा- आचार्य जानकी वल्लभ शास्त्री का काव्य संसार बहुत ही विविध और व्यापक है। प्रारंभ में उन्होंने संस्कृत में कविताएँ लिखीं। फिर महाकवि निराला की प्रेरणा से हिंदी में आए। उनका जन्म 5 फरवरी 1916 में बिहार के मैगरा गाँव में हुआ था। इनके पिता स्व. रामानुग्रह शर्मा था। उन्हें पशुओं का पालन करना बहुत पसंद था। उनके यहाँ दर्जनों गउएं, सांड, बछड़े तथा बिल्लियाँ और कुत्ते थे। पशुओं से उन्हें इतना प्रेम था कि गाय क्या, बछड़ों को भी बेचते नहीं थे और उनके मरने पर उन्हें अपने आवास के परिसर में दफ़न करते थे।
उनका दाना-पानी जुटाने में उनका परेशान रहना स्वाभाविक था। उन्होंने मात्र 11 वर्ष की वय में ही इन्होंने 1927 में बिहार-उड़ीसा की प्रथमा परीक्षा प्रथम श्रेणी में उत्तीर्ण की। शास्त्री की उपाधि 16 वर्ष की आयु में प्राप्तकर ये काशी हिन्दू विश्वविद्यालय चले गए। ये वहां 1932 से 1938 तक रहे। उनकी विधिवत् शिक्षा-दीक्षा तो संस्कृत में ही हुई थी, लेकिन अपने श्रम से उन्होंने अंग्रेज़ी और बांग्ला का प्रभूत ज्ञान प्राप्त किया। वह रवींद्रनाथ के गीत सुनते थे और उन्हें गाते भी थे। अत्यंत बाल्य-वय में ही इनको अपने माता की स्नेहिल-छाया से वंचित हो जाना पड़ा। आर्थिक समस्याओं के निदान हेतु इन्होंने बीच-बीच में नौकरी भी की। 1936 में लाहौर में अध्यापन कार्य किया और 1937-38 में रायगढ़ में राजकवि भी रहे। 1934-35 में इन्होंने साहित्याचार्य की उपाधि स्वर्णपदक के साथ अर्जित की और पूर्वबंग सारस्वत समाज ढाका के द्वारा साहित्यरत्न घोषित किए गए। 1940-41 में रायगढ़ छोड़कर मुजफ्फरपुर आने पर इन्होंने वेदांतशास्त्री और वेदांताचार्य की परीक्षाएं बिहार भर में प्रथम आकर पास की। 1944 से 1952 तक गवर्नमेंट संस्कृत कॉलेज में साहित्य-विभाग में प्राध्यापक, पुनः अध्यक्ष रहे। 1953 से 1978 तक बिहार विश्वविद्यालय के रामदयालु सिंह कॉलेज, मुजफ्फरपुर में हिन्दी के प्राध्यापक रहकर 1979-80 में अवकाश ग्रहण किया। उनका पहला गीत ‘किसने बांसुरी बजाई’ बहुत लोकप्रिय हुआ।
प्रो. नलिन विमोचन शर्मा ने उन्हें प्रसाद, निराला, पंत और महादेवी के बाद पांचवां छायावादी कवि कहा है, लेकिन सचाई यह है कि वे भारतेंदु और श्रीधर पाठक द्वारा प्रवर्तित और विकसित उस स्वच्छंद धारा के अंतिम कवि थे, जो छायावादी अतिशय लाक्षणिकता और भावात्मक रहस्यात्मकता से मुक्त थी। शास्त्रीजी ने कहानियाँ, काव्य-नाटक, आत्मकथा, संस्मरण, उपन्यास और आलोचना भी लिखी है। इन्होंने सोलह-सत्रह की अवस्था में ही लिखना प्रारंभ किया था। इनकी प्रथम रचना ‘गोविन्दगानम्’ है जिसकी पदशय्या को कवि जयदेव से अबोध स्पर्द्धा की विपरिणति मानते हैं। रूप-अरूप और तीन-तरंग के गीतों के पश्चात् कालन, अपर्णा, लीलाकमल और बांसों का झुरमुट- चार कथा संग्रह कमशः प्रकाशित हुए।
इनके द्वारा लिखित चार समीक्षात्मक ग्रंथ- साहित्यदर्शन चिंताधारा, त्रयी और प्राच्य साहित्य हिन्दी में भावात्मक समीक्षा के सर्जनात्मक रूप के कारण समादृत हुआ।1945-50 तक इनके चार गीति काव्य प्रकाशित हुए- शिप्रा, अवन्तिका, मेघगीत और संगम। कथाकाव्य गाथा का प्रकाशन सामाजिक दृष्टिकोण से क्रांतिकारी है। इन्होंने एक महाकाव्य राधा की रचना की जो सन् 1971 में प्रकाशित हुई। हंस बलाका गद्य महाकाव्य की इनकी रचना हिन्दी जगत् की एक अमूल्य निधि है। छायावादोत्तर काल में प्रकाशित पत्र-साहित्य में व्यक्तिगत पत्रों के स्वतंत्र संकलन के अंतर्गत शास्त्री द्वारा संपादित निराला के पत्र उल्लेखनीय है।
इनकी प्रमुख कृतियां संस्कृत में- काकली, बंदीमंदिरम, लीलापद्मम्, हिन्दी में रूप-अरूप, कानन, अपर्णा, साहित्यदर्शन, गाथा, तीर-तरंग, शिप्रा, अवन्तिका, मेघगीत, चिंताधारा, प्राच्यसाहित्य, त्रयी, पाषाणी, तमसा, एक किरण सौ झाइयां, स्मृति के वातायन, मन की बात, हंस बलाका, राधा आदि हैं। उनका उपन्यास कालिदास भी बृहत प्रसिद्ध हुआ था। उनका हृदयगति रुक जाने से 7 अप्रैल 2011 को बिहार के मुजफ्फरपुर ज़िले में निधन हो गया। वह 96 वर्ष के थे।



