शास्त्रीय नृत्य में मृणालिनी साराभाई के योगदान तथा उपलब्धियाँ चिरस्मरणीय : डॉ. प्रदीप सिंह देव

- शास्त्रीय नृत्यांगना मृणालिनी साराभाई की पुण्यतिथि
देवघर। मृणालिनी साराभाई भारत की प्रसिद्ध शास्त्रीय नृत्यांगना थीं। उन्हें ‘अम्मा’ के तौर पर जाना जाता था। शास्त्रीय नृत्य में उनके योगदान तथा उपलब्धियों को देखते हुए भारत सरकार ने उन्हें ‘पद्मभूषण’ से सम्मानित किया था। उनकी मृत्यु 21 जनवरी, 2016 को हुई थी। मौके पर स्थानीय ओमसत्यम इंस्टिट्यूट ऑफ फिल्म, ड्रामा एंड फाइन आर्ट्स के निदेशक डॉ. प्रदीप कुमार सिंह देव ने उन्हें श्रद्धांजलि अर्पित करते हुए कहा- मृणालिनी साराभाई का जन्म भारतीय राज्य केरल में 11 मई, 1918 को हुआ था। उनके पिता डॉ. स्वामीनाथन मद्रास हाईकोर्ट में बैरिस्टर थे। मां अम्मू स्वामीनाथन स्वतंत्रता सेनानी थीं, जो बाद में देश की पहली संसद की सदस्य भी रहीं। बहन लक्ष्मी सहगल सुभाषचंद्र बोस के साथ थीं। उन्होंने बचपन का अधिकांश समय स्विट्जरलैंड में बिताया।
यहां ‘डेलक्रूज स्कूल’ से उन्होंने पश्चिमी तकनीक से नृत्य कलाएं सीखीं। फिर उन्होंने रबींद्रनाथ टैगोर की देख-रेख में शांति निकेतन में शिक्षा ग्रहण की और यहीं से नृत्य उनकी जिंदगी बन गया। उनके पति विक्रम साराभाई देश के सुप्रसिद्ध भौतिक वैज्ञानिक थे। उनकी बेटी मल्लिका साराभाई भी प्रसिद्ध नृत्यांगना और समाजसेवी हैं। तत्कालीन समय में यह वह दौर, था जब कलाकार सिर्फ एक ‘फॉर्म’ नहीं सीखते थे। उन्होंने भी नृत्य की अलग-अलग शैलियों की बारीकियां सीखीं। उन्होंने अमूबी सिंह से मणिपुरी नृत्य सीखा। कुंजु कुरूप से कथकली सीखा। मीनाक्षी सुदंरम पिल्लै और मुथुकुमार पिल्लै से भरतनाट्यम सीखा। उनके हर एक गुरू का अपनी अपनी कला में जबरदस्त योगदान था। इसी दौरान उन्होंने विश्वविख्यात सितार वादक पंडित रविशंकर के भाई पंडित उदय शंकर के साथ भी काम किया। पंडित उदय शंकर का भारतीय कला को पूरी दुनिया में अलग पहचान दिलाने का श्रेय जाता है।
उन्होंने आधुनिक नृत्य को लोकप्रियता और कामयाबी के अलग मुकाम पर पहुंचाया। इस बीच वे कुछ दिनों के लिए अमेरिका भी गईं और वहां जाकर ड्रामाटिक आर्ट्स की बारीकियां सीखीं। इसके बाद उन्होंने मृणालिनी देश दुनिया में भारतीय नृत्य परंपरा का विकास किया। उन्होंने भारत लौटकर जानी-मानी नृत्यांगना मीनाक्षी सुंदरम पिल्लई से भरतनाट्यम का प्रशिक्षण लिया और फिर दक्षिण भारतीय शास्त्रीय नृत्य और पौराणिक गुरु थाकाज़ी कुंचू कुरुप से कथकली के शास्त्रीय नृत्य-नाटक में प्रशिक्षण लिया। भारत सरकार की ओर से उन्हें देश के प्रसिद्ध नागरिक सम्मान ‘पद्मभूषण’ और ‘पद्मश्री’ से सम्मानित किया गया था। ‘यूनिवर्सिटी ऑफ़ ईस्ट एंगलिया’, नॉविच यूके ने भी उन्हें डॉक्टरेट की उपाधि दी थी। ‘इंटरनेशनल डांस काउंसिल पेरिस’ की ओर से उन्हें एग्जीक्यूटिव कमेटी के लिए भी नामित किया गया था। प्रसिद्ध ‘दर्पणा एकेडमी’ की स्थापना उन्होंने की थी।



