भारतीय अर्थव्यवस्था पर संकट गहराया, मोदी सरकार पर विपक्ष का बड़ा हमला
indian-economy-crisis-opposition-targets-modi-government

भारतीय अर्थव्यवस्था पर गंभीर संकट, मोदी सरकार आत्मप्रशंसा में व्यस्त
भारतीय अर्थव्यवस्था को लेकर माहौल इतना नकारात्मक हो गया है कि अब मोदी सरकार के प्रोफेशनल चीयरलीडर्स भी सार्वजनिक रूप से अपनी चिंताएं जताने लगे हैं। महंगाई के अनुमान तेजी से बढ़ रहे हैं, जबकि विकास दर के अनुमान उल्लेखनीय रूप से घट रहे हैं। प्रत्यक्ष विदेशी निवेश (FDI) लगातार सिकुड़ रहा है और सप्लाई चेन का प्रबंधन इतनी बुरी तरह किया गया है कि प्रधानमंत्री अब स्वयं उपभोक्ताओं से अपनी खपत कम करने की अपील कर रहे हैं।
इन चिंताओं में कुछ भी नया नहीं है। भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस काफी समय से इन्हें उठाती रही है। इनमें सबसे महत्वपूर्ण चिंता सुस्त निवेश माहौल को लेकर रही है।
निजी निवेश की दर में उल्लेखनीय बढ़ोतरी के बिना आर्थिक विकास को तेज गति नहीं दी जा सकती और न ही उसे लंबे समय तक ऊंचे स्तर पर बनाए रखा जा सकता है। लेकिन निजी निवेश इसलिए आगे नहीं बढ़ पा रहा है क्योंकि—
- वास्तविक मजदूरी में ठहराव बना हुआ है, जिससे सभी आय वर्गों में खपत की वृद्धि दब गई है। उपभोक्ता मांग के अभाव में भारतीय उद्योग जगत के पास निवेश करने का कोई प्रोत्साहन नहीं है।
- नीतियों में बार-बार बदलाव, प्रशासनिक आदेशों, टैक्स नोटिसों, छापों और जांच एजेंसियों की कार्रवाई की धमकियों ने निवेश समुदाय में भय और कारोबारी अनिश्चितता का माहौल पैदा कर दिया है।
- चीन की अत्यधिक औद्योगिक क्षमता से होने वाली डंपिंग ने भारतीय विनिर्माण क्षेत्र और स्थानीय उत्पादों की मांग को गंभीर रूप से प्रभावित किया है।
- सरकार समर्थित क्रोनी कैपिटलिज्म ने स्वामित्व के बढ़ते केंद्रीकरण को बढ़ावा दिया है। इसका सबसे बड़ा उदाहरण “मोदानी” मॉडल है, जहां प्रधानमंत्री के करीबी मित्रों को सरकारी संरक्षण के माध्यम से लाभ पहुंचाया जा रहा है।
आज कॉरपोरेट जगत के पास स्वतंत्र रूप से निवेश करने और जोखिम उठाने का प्रोत्साहन कम होता जा रहा है, क्योंकि मुनाफा मोदी सरकार के “चंदा लो, धंधा दो” तंत्र के माध्यम से भी आसानी से कमाया जा सकता है।
कॉरपोरेट इंडिया पर टैक्स दरें रिकॉर्ड निचले स्तर पर हैं और उसकी कमाई रिकॉर्ड ऊंचाई पर है। शेयर बाजार के मूल्यांकन भी मजबूत दिखाई देते हैं। इसके बावजूद निवेश की गति स्पष्ट रूप से नदारद है। जो निवेश करने की स्थिति में हैं, वे बड़ी संख्या में विदेशों की ओर रुख कर रहे हैं और वहीं निवेश कर रहे हैं।
बड़े-बड़े निवेश घोषणाएं लगातार की जा रही हैं, लेकिन इनमें से कितनी घोषणाएं वास्तव में जमीन पर परिसंपत्तियों (assets) में बदलती हैं, यह गंभीर प्रश्न बना हुआ है।
प्रधानमंत्री टॉफियां बांटने और जनता से नैतिक अपील करने में व्यस्त हैं, जबकि देश के पैरों तले जमीन खिसक रही है। देश को आर्थिक नीतियों में आमूलचूल बदलाव की आवश्यकता है, लेकिन मोदी सरकार के पास आत्मप्रशंसा के अलावा कोई नया विचार नहीं बचा है।
प्रधानमंत्री “ज्ञानेश” के जरिए चुनाव तो मैनेज कर रहे हैं, लेकिन अर्थव्यवस्था को लेकर उन्हें तत्काल नए ज्ञान की आवश्यकता है।



