बिहार की सत्ता में लव-कुश समीकरण की दूसरी पीढ़ी का उभार


ऐतिहासिक गाँधी मैदान में 12 फरवरी 1994 को कुर्मी चेतना रैली का आयोजन किया गया। इस रैली के मुख्य सूत्रधार कम्युनिस्ट नेता सतीश कुमार, भोलानाथ सिंह और ब्रह्मानंद मंडल थे। रैली में लाखों की भीड़ जुटी। निसंदेह पहली बार किसी जाति के इतनी बड़ी संख्या में लोग जुटे थे। रैली में सरकार से राजनीतिक और प्रशासनिक हिस्सेदारी की माँग की गई थी। लेकिन विशाल रैली के बावजूद लालू सरकार और मुस्लिम-यादव समीकरण को चुनौती देना आसान नहीं था। तब जाकर ओबीसी की बड़ी आबादी वाले कुशवाहा समाज से सामाजिक व राजनीतिक गठबंधन बनाया गया। बिहार में लव-कुश समीकरण की उत्पत्ति यादव वोट बैंक की एकाधिकार वाली राजनीति का मुकाबला करने के लिए हुई। माय समीकरण के वोट बैंक से मुकाबले के लिए नीतीश कुमार और शकुनी चौधरी ने कुशवाहा मतदाताओं को राजनीतिक हथियार के तौर पर इस्तेमाल किया। जनता दल के कुछ सांसदों और विधायकों ने मिलकर जॉर्ज फर्नांडीज के नेतृत्व में समता पार्टी का गठन किया। जॉर्ज, नीतीश और शकुनी इसके संस्थापक सदस्य थे।
पार्टी गठन और एक दशक के लंबे संघर्ष के बाद 2005 में नीतीश कुमार की अगुवाई में भाजपा के सहयोग से एनडीए की सरकार बनी। नीतीश कुमार दो दशक से अधिक समय तक मुख्यमंत्री बने रहे। 15 अप्रैल 2026 को राजनीतिक परिवर्तन हुआ। भारतीय जनता पार्टी के नेता और कुशवाहा समाज के सम्राट चौधरी मुख्यमंत्री बने।
विदित हो कि लव-कुश समीकरण आगे चलकर केवल दो जातियों की एकजुटता और राजनीतिक समीकरण तक सीमित नहीं रहा। नीतीश कुमार के दो दशक तक मुख्यमंत्री रहने के दौरान एक नया सामाजिक वर्ग तैयार हुआ। इसके साथ धानुक, दांगी, मल्लाह, गंगोता जैसी दर्जनों जातियाँ लव-कुश समीकरण से जुड़ गईं। इस व्यापक सामाजिक गठजोड़ को एक साथ रखना वर्तमान मुख्यमंत्री के लिए चुनौती होगी। लव-कुश समीकरण एक व्यापक सामाजिक समीकरण के रूप में उभरा। अति पिछड़ी जातियों का इस समीकरण से जुड़ना बड़ी बात है।
लव-कुश समीकरण के जनक, समता पार्टी और जदयू के संस्थापक सदस्य नीतीश कुमार, शकुनी चौधरी, उपेन्द्र कुशवाहा, बैद्यनाथ महतो आदि के परिवार यानी दूसरी पीढ़ी अब सत्ता के केंद्र में आ गई है।
सम्राट चौधरी : सम्राट चौधरी 15 अप्रैल 2026 को बिहार के मुख्यमंत्री बने। इन्होंने अपनी राजनीति की शुरुआत समाजवादी पृष्ठभूमि से की। इन्हें राजनीति का लंबा अनुभव है। ये भाजपा के प्रदेश उपाध्यक्ष से प्रदेश अध्यक्ष, प्रतिपक्ष के नेता, मंत्री, गृह मंत्री और उपमुख्यमंत्री रहे। इनके पिता शकुनी चौधरी 7 बार विधायक, पूर्व मंत्री और लोकसभा सदस्य रहे हैं। इनकी माता स्व. पार्वती देवी तारापुर से विधायक रह चुकी हैं। शकुनी चौधरी लव-कुश समीकरण और समता पार्टी के संस्थापक सदस्य रहे हैं। वर्तमान में राजनीति से संन्यास ले चुके हैं।
निशांत कुमार : पूर्व मुख्यमंत्री और जदयू के राष्ट्रीय अध्यक्ष नीतीश कुमार के पुत्र हैं। नीतीश कुमार लव-कुश समीकरण के जनक और समता पार्टी के संस्थापक रहे हैं। नीतीश कुमार बढ़ती उम्र और पुत्र के राजनीति में प्रवेश को देखते हुए राजनीति की मुख्यधारा से अलग होकर संरक्षक की भूमिका में आ गए हैं। निशांत कुमार सम्राट चौधरी के मंत्रिमंडल में 7 मई को स्वास्थ्य मंत्री बने हैं। निशांत कुमार फिलहाल किसी सदन के सदस्य नहीं हैं। निशांत के राजनीति में आने से कुर्मी समाज और लव-कुश समीकरण को संजीवनी मिलेगी। दूसरी ओर जदयू को वारिस मिल गया है।
दीपक प्रकाश – दीपक प्रकाश उपेन्द्र कुशवाहा के पुत्र हैं। दीपक प्रकाश सम्राट चौधरी के मंत्रिमंडल में पंचायती राज मंत्री बने हैं। निशांत की तरह दीपक प्रकाश अभी किसी सदन के सदस्य नहीं हैं। इनकी माता स्नेहलता कुशवाहा सासाराम से विधायक हैं। उपेन्द्र कुशवाहा समाज में लोकप्रिय नेता हैं। इनकी राजनीतिक पृष्ठभूमि समाजवादी रही है। इन्होंने अपनी राजनीति की शुरुआत लोकदल से की थी। 1994 में समता पार्टी के संस्थापक सदस्यों में शामिल थे।
सुनील कुशवाहा : सुनील कुशवाहा जदयू से वाल्मीकिनगर के सांसद हैं। इनके पिता बैजनाथ महतों दो बार नौतन से विधायक और वाल्मीकिनगर से सांसद रहे हैं। इन्होंने सहकारिता विभाग की नौकरी छोड़कर राजनीति में प्रवेश किया था। नब्बे के दशक में दस्यु सरगनाओं के दौर में बैजनाथ महतों ने संघर्ष किया। नब्बे के दशक में चंपारण में लूट, डकैती व अपहरण के खिलाफ उन्होंने जो मुहिम चलाई, उसके कारण वे “चंपारण टाइगर” के नाम से विख्यात हुए। जदयू सांसद बैजनाथ महतों का निधन 28 फरवरी 2020 को हुआ। इनके पुत्र सुनील कुशवाहा वाल्मीकिनगर से लगातार सांसद बने हुए हैं और लव-कुश समीकरण के योद्धा के रूप में कायम हैं।
जयंत राज कुशवाहा : जयंत राज कुशवाहा नीतीश कुमार के मंत्रिमंडल में ग्रामीण विकास, लघु जल संसाधन और भवन निर्माण मंत्री रहे। वर्तमान में जदयू विधायक हैं। लव-कुश समीकरण के वाहक हैं। इनके पिता जनार्दन मांझी कुशवाहा ने 2005 के विधानसभा चुनाव में राजद का गढ़ माने जाने वाले बेलहर विधानसभा से रामदेव यादव को हराया था। इन्होंने अपनी राजनीति की शुरुआत स्थानीय निकाय से की। ये बिहार राज्य परिवहन निगम में नौकरी करते थे। पूर्व केंद्रीय मंत्री स्व. दिग्विजय सिंह के बेहद करीबी थे। जनार्दन मांझी का निधन 2021 में हुआ। उनके निधन के उपरांत इनके पुत्र जयंत राज कुशवाहा लगातार विधायक बने हुए हैं।
लव-कुश समीकरण का बीजारोपण बिहार की राजनीति की नजीर बन चुका है। इस समीकरण को सभी पार्टी को नजरअंदाज करना अब मुश्किल है। दर्जनों छोटी जातियाँ इस राजनीतिक समीकरण के साथ आ गई हैं। जो कल तक लालू प्रसाद के सामाजिक न्याय की परिधि की मानी जाती थीं, वे आज लव-कुश के साथ हैं। मुख्यमंत्री सम्राट चौधरी के लिए इसे एक सूत्र में पिरोकर रखना बड़ी चुनौती होगी।
(ये लेखक के निजी विचार है)



