बेटी के प्रति पिता के निस्वार्थ प्रेम और ईश्वर पर पूर्ण समर्पण के प्रसंग ने श्रद्धालुओं को किया भावविभोर

जमशेदपुर। साकची बोधि मंदिर मैदान में चल रहे धार्मिक कथा नानी बाई रो मायरो का तीसरे एवं अंतिम दिन गुरूवार को विश्वविख्यात आध्यात्मिक प्रवक्ता पूज्या जया किशोरी ने व्यास पीठ से अपनी सुमधुर वाणी से नानी बाई एवं नरसी मेहता मिलन, श्री कृष्ण रूकमणी सहित मायरा भरने की भावपूर्ण कथा के प्रसंग को गाकर सुनाया, जिससे श्रोता भावविभोर हो गए। कथा का विस्तार से वर्णन करते हुए कहा कि यह कथा बेटी के प्रति पिता के निस्वार्थ प्रेम और ईश्वर पर पूर्ण समर्पण को दर्शाती है।

भगवान ने स्वयं को नरसी जी का सेवक बताते हुए यह संदेश दिया कि सच्चे भक्त की लाज रखना ही उनका धर्म है। उन्होंने मनुष्य जीवन को अनमोल बताते हुए भक्तों को सदुपयोग करने की बात कही एवं भगवान का भजन करने से जीवन का कल्याण होने की बाते अपने कथा में कही। प्रसिद्ध कथावाचिका जया किशोरी के अनुसार, जब भक्त नरसी मेहता के पास अपनी बेटी नानी बाई के मायरे (भात) के लिए कुछ भी नहीं था, तब उन्होंने अपना सर्वस्व भगवान श्रीकृष्ण को समर्पित कर दिया। नानी बाई अपने ससुराल में मायरा न भर पाने के कारण ताने सुनती थी। दुखी होकर उसने अपने पिता नरसी मेहता को संदेश भेजा। नरसी जी अत्यंत गरीब थे, लेकिन उनकी आस्था अटूट थी। उन्होंने सांसारिक साधनों के बजाय सीधे भगवान कृष्ण को पुकारा और कहा, “सांवरिया! अब तेरी बेटी की लाज तेरे हाथ है।” भक्त की इस सच्ची पुकार से प्रसन्न होकर भगवान श्रीकृष्ण स्वयं नरसी मेहता का रूप धारण कर नानी बाई के ससुराल पहुंचे।

वहां उन्होंने सोने की मोहरों, बहुमूल्य वस्त्रों और रत्नों से भरा 56 करोड़ का भव्य मायरा प्रस्तुत किया। बैलगाड़ियों से आए इस दिव्य मायरे को देखकर सभी चकित रह गए। यह कथा सिखाती है कि जब मनुष्य पूरी श्रद्धा और विश्वास से भगवान पर निर्भर होता है, तब वे स्वयं उसकी जिम्मेदारी उठाते हैं। तीन दिवसीय कथा का आयोजन शहर की सामाजिक एवं धार्मिक संस्था नारायणी सेवा ट्रस्ट जमशेदपुर द्धारा किया गया था। तीनों दिन कथा का आरंभ होने से पहले विधिवत पूजा-अर्चना यजमानों द्धारा की गई। कोलकाता से आये आचार्य अभिषेक तिवारी ने पूजा करायी। व्यास पीठ पर जया किशोरी के विराजमान होने के बाद पारंपरिक रूप से उनका स्वागत सत्कार किया गया। जया किशोरी जी की सुमधुर वाणी से कथा सुनने के लिए तीनों दिन पूरा पंडाल भरा हुआ था। रोजाना लगभग तीन हजार से अधिक श्रद्धालुगण उपस्थित हुए।

 

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