फटी जेब में चाय की चुस्की और विश्व-शांति की रणनीति

-आर. के. पंडित
आजकल के दौर में अगर आपको राजनीति समझनी है, तो किसी भारी-भरकम किताब या न्यूज स्टूडियो जाने की जरूरत नहीं है। बस अपने मोहल्ले के उस नुक्कड़ वाले चाय के ठेले पर चले जाइए, जहाँ भाप उड़ती चाय के साथ ‘सरकारें’ बनाई और गिराई जाती हैं। यहाँ आपको ऐसे-ऐसे ‘स्वघोषित चाणक्य’ मिलेंगे, जिनके घर की नाली भले ही पिछले छह महीने से जाम हो, लेकिन उनके पास रूस-यूक्रेन युद्ध रोकने का ऐसा सटीक फॉर्मूला है कि पुतिन भी सुन लें तो रिटायरमेंट ले लें।
मोहल्ले का वह कोना जहाँ चाय की केतली चौबीस घंटे ‘इंकलाब’ उगलती है, दरअसल वह हमारे देश का असली ‘कंट्रोल रूम’ है। यहाँ बैठने वाले महानुभावों की सबसे बड़ी त्रासदी यह है कि उनकी सलाह पर न तो भारत सरकार ध्यान देती है और न ही उनका कुत्ता। ये वे लोग हैं जिनके पास युद्ध रुकवाने का ऐसा जादुई नुस्खा है कि अगर उसे लागू कर दिया जाए, तो पुतिन और जेलेंस्की एक ही थाली में बैठकर छोले-भटूरे खाने लगें। पर विडंबना देखिए, ये वही ‘रणनीतिकार’ हैं जो अपनी पत्नी को इस बात के लिए राजी नहीं कर पाते कि संडे को खाने में कद्दू की सब्जी न बने।
मजेदार बात यह है कि इन ‘विश्व-नेताओं’ का अपना एक ‘जियो-पॉलिटिकल’ ढांचा होता है। इनके लिए अमेरिका बस एक ऐसा बिगड़ा हुआ बच्चा है जिसे अगर दो दिन ‘राशन कार्ड’ की लाइन में खड़ा कर दिया जाए, तो वह सुधर जाएगा। वहीं चीन के मामले में इनका तर्क बड़ा सरल है—”भाई साहब, जिस देश के लोग सांप-बिच्छू खा जाते हैं, उनकी बातों का क्या बुरा मानना?” यह सुनकर बगल में खड़ा व्यक्ति, जो खुद पिछले चार साल से अपनी पुरानी साइकिल का टायर नहीं बदलवा पाया है, ऐसे गंभीरता से सिर हिलाता है जैसे भारत की ‘विदेश नीति’ का ड्राफ्ट उसी की रज़ामंदी से तैयार हुआ हो।
अक्सर देखा गया है कि ये ‘महारथी’ घर की टूटी हुई कुंडी और बहते हुए नल पर कभी चर्चा नहीं करते, क्योंकि उन्हें लगता है कि महान आत्माओं को ‘घरेलू’ काम शोभा नहीं देते। लेकिन जैसे ही टीवी डिबेट की बैठक शुरू होती है, इनकी आँखों में ऐसी चमक आती है जैसे खुद ही डिबेट में भाग लेकर इन्हे ही देश की सुरक्षा दी गयी हो। इनकी बातचीत में शब्दों की बाजीगरी ऐसी होती है कि ‘इकोनॉमी’ और ‘डेमोक्रेसी’ जैसे शब्द ऐसे उछाले जाते हैं जैसे शादी में ‘बताशे’ बांटे जा रहे हों।
अंत में, यह व्यंग्य सिर्फ हंसी नहीं, एक आईना है। हम उस समाज में जी रहे हैं जहाँ ‘ओपिनियन’ मुफ्त है और ‘फैक्ट’ महंगा। हम अपनी छोटी जिम्मेदारियों से भागने के लिए बड़ी-बड़ी वैश्विक समस्याओं पर अपना दरबार सजाते हैं। सच तो यह है कि जिस दिन नुक्कड़ का यह ‘चाणक्य’ अपने घर का कचरा सही जगह फेंकना सीख जाएगा, उस दिन देश की आधी राजनीति अपने आप सुधर जाएगी। पर फिलहाल, चाय ठंडी हो रही है और ‘विश्व-शांति’ का मुद्दा अभी भी गरम है!



