शिव : शून्य, अनंत और अखंड, परम चेतना और शाश्वत सत्य

-डाॅ. पंकज भारती 

ब्रह्मांड के अस्तित्व और उसके परे स्थित परम चेतना को यदि किसी एक शब्द में समाहित किया जा सके, तो वह शब्द ‘शिव’ ही होगा। शिव किसी एक रूप, आकृति या व्यक्ति तक सीमित नहीं हैं; शिव एक तत्व हैं—सर्वव्यापी, निराकार और शाश्वत। वे किसी दर्शन की परिभाषा में बंधने वाले विचार नहीं, बल्कि अनुभूति की उस अवस्था का नाम हैं, जहाँ शब्द, तर्क और भाषा स्वयं मौन हो जाते हैं। शिव ही शून्य हैं और शिव ही अनंत। यही विरोधाभास प्रतीत होने वाली बातें, जो बातें हमें एक-दूसरे के विपरीत लगती हैं, शिव-दर्शन का मूल आधार है। क्योंकि ये वास्तव में एक ही सत्य के दो रूप हैं। शून्य, जहाँ कुछ भी नहीं है—और अनंत, जहाँ सब कुछ है—इन दोनों के मध्य जो सेतु है, वही शिव है। सृष्टि की उत्पत्ति से पूर्व भी शिव थे और सृष्टि के लय के पश्चात भी शिव ही शेष रहेंगे। वे न आदि हैं, न अंत—वे स्वयं काल के भी परे हैं। जहाँ मानवीय बुद्धि अपनी सीमाओं से टकराकर ठहर जाती है, जहाँ गणित के जटिलतम समीकरण भी उत्तर देने से असमर्थ हो जाते हैं, और जहाँ विज्ञान अपनी खोजों के बावजूद अंतिम सत्य को स्पर्श नहीं कर पाता—वहीं से शिव का साम्राज्य आरम्भ होता है। शिव उस सत्य का नाम हैं, जिसे जाना नहीं जा सकता, केवल जिया जा सकता है। इस चराचर जगत में जो कुछ भी दृश्य है—पर्वत, नदियाँ, आकाश, अग्नि, वायु—और जो कुछ भी अदृश्य है—ऊर्जा, चेतना, विचार और भाव, उन सभी के मूल में जो सूक्ष्म, निरंतर स्पंदन विद्यमान है, वही शिव है। प्रत्येक कण में, प्रत्येक श्वास में, प्रत्येक नाद में शिव की उपस्थिति है। वे सृष्टा भी हैं, संहारक भी और संतुलन के साक्षात प्रतीक भी। शिव भय नहीं, बल्कि निर्भयता हैं; शिव वैराग्य हैं, पर जीवन से पलायन नहीं। वे तपस्या हैं, पर जड़ता नहीं। शिव उस परम स्वतंत्र चेतना का नाम हैं, जो बंधनों से मुक्त होकर भी सृष्टि को अपने आलोक से प्रकाशित करते है।

इसलिए शिव को जानना किसी सिद्धांत को समझना नहीं, बल्कि स्वयं को पहचानना है—क्योंकि जहाँ चेतना है, वहीं शिव हैं। शून्य की अवधारणा को समझना शिव को समझने की पहली सीढ़ी है। क्योंकि शिव किसी सीमित रूप या मूर्ति तक बँधे हुए ईश्वर नहीं हैं, बल्कि वे एक मूल तत्त्व हैं। वे सृष्टि से पूर्व भी हैं, सृष्टि के दौरान भी और सृष्टि के लय के पश्चात भी विद्यमान रहते हैं। यही स्थिति शून्य की भी है। शून्य का अर्थ पूर्ण अभाव नहीं, बल्कि वह मौन अवस्था है जिसमें अनन्त संभावनाएँ निहित रहती हैं। जैसे शून्य से गणना आरम्भ होती है, वैसे ही शिव से सृष्टि का स्पन्दन प्रारम्भ होता है। भारतीय दर्शन में शून्य को रिक्तता नहीं, बल्कि आधार माना गया है। उसी आधार से सृष्टि की उत्पत्ति होती है और उसी में उसका विलय होता है। शिव इस सम्पूर्ण प्रक्रिया के साक्षी भी हैं और नियंता भी। ध्यान और समाधि की अवस्था में जब मन सभी विचारों से मुक्त होकर स्थिर हो जाता है, तब जो अनुभूति होती है, वही शून्य की अनुभूति है। यह अवस्था शिव-चेतना के समीप ले जाती है, जहाँ न कर्ता रहता है, न भोग्ता, केवल शुद्ध साक्षी भाव शेष रहता है। शिव का ताण्डव सामान्य अर्थों में विनाश का प्रतीक नहीं है, बल्कि वह रूपों के लय होकर शून्य में विलीन होने की प्रक्रिया है, जिससे नवीन सृष्टि का मार्ग प्रशस्त होता है। इसी प्रकार जीवन में जब अहंकार, आसक्ति और सीमित ‘मैं’ का भाव शून्य होता है, तब शिव का बोध संभव होता है। यही कारण है कि उपनिषदों में ‘शिवोऽहम्’ का भाव प्रकट होता है—अर्थात जब अहं (अहंकार) शून्य हुआ, तभी शिव का अनुभव हुआ। इसके अतिरिक्त हम अक्सर शून्य को ‘कुछ नहीं’ या अभाव के रूप में देखते हैं, किन्तु अध्यात्म की दृष्टि में शून्य, रिक्तता नहीं बल्कि पूर्णता का गर्भ है। यह वह अवस्था है जहाँ सृजन की सभी संभावनाएं सुप्त अवस्था में विद्यमान हैं। विज्ञान जिसे ‘ब्लैक होल’ कहता है, जहाँ गुरुत्वाकर्षण इतना घना होता है कि प्रकाश भी नहीं बच पाता, वह शिव का ही एक भौतिक स्वरूप है। उस अंधकार में, उस सन्नाटे में, उस महाशून्य में ही नवनिर्माण के बीज छिपे होते हैं। जब हम अपनी आँखें बंद करते हैं और विचारों के शोर को शांत करते हैं, तो अंतर्मन में जिस गहरे सन्नाटे का अनुभव होता है, वह शून्य रूपी शिव है। यह वह अवस्था है जहाँ ‘मैं’ का अहंकार विलीन हो जाता है और केवल अस्तित्व शेष रहता है। दूसरी ओर, शिव अनंत हैं। अनंत का अर्थ है जिसका न कोई आदि है और न कोई अंत। यदि शून्य वह कैनवास है जिस पर चित्र उकेरा जाना है, तो अनंत वह चित्र है जो कभी पूरा नहीं होता, बस फैलता जाता है। ब्रह्मांड का विस्तार शिव का ही विस्तार है। अरबों आकाशगंगाएँ, खरबों तारे, और अनगिनत ग्रह जिस ऊर्जा से संचालित हो रहे हैं, वह ऊर्जा शिव है।

जब शिव अपनी समाधि से जागते हैं और नृत्य करते हैं, तो वह नटराज कहलाते हैं। उनका तांडव केवल विनाश का नृत्य नहीं है, बल्कि वह, ऊर्जा का वह विस्फोट है जिससे परमाणुओं में गति आती है। इलेक्ट्रॉन का नाभिक के चारों ओर घूमना, पृथ्वी का सूर्य की परिक्रमा करना, और हमारी नसों में रक्त का प्रवाह—यह सब शिव के इटर्नल कॉस्मिक डांस का ही हिस्सा है। शिव को ‘भोला’ भी कहा जाता है और ‘रौद्र’ भी। यह द्वंद्व उनके व्यक्तित्व का सबसे आकर्षक पहलू है। वह भोले इसलिए हैं क्योंकि वे सहज हैं। उन्हें प्रसन्न करने के लिए किसी जटिल कर्मकांड की आवश्यकता नहीं होती; वे केवल एक लोटा जल और बेलपत्र से ही नहीं, बल्कि शुद्ध भाव से ही तृप्त हो जाते हैं। उनका भोलापन उस बच्चे की तरह है जो दुनिया के छल-कपट से परे है, जो अपने ही आनंद में मग्न है। यह भोलापन हमें सिखाता है कि ईश्वर को पाने के लिए चालाकी नहीं, सरलता चाहिए। लेकिन, जब धर्म की हानि होती है, जब सत्य को कुचला जाता है, तो वही भोला शंकर, रूद्र का रूप धारण कर लेता है। रूद्र, यानी वह जो रोदन (दुःख) का नाश करे, या वह जो अपने तेज से भय उत्पन्न करे। उनका क्रोध व्यक्तिगत द्वेष के लिए नहीं होता, बल्कि संतुलन स्थापित करने के लिए होता है। उनका रौद्र रूप भी करुणा से भरा है, ठीक वैसे ही जैसे एक सर्जन का चाकू रोगी को दर्द देने के लिए नहीं, बल्कि उसके रोग को काटकर उसे जीवन देने के लिए होता है। शिव का ‘नीलकंठ’ स्वरूप त्याग और जिम्मेदारी का सर्वोच्च उदाहरण है। जब समुद्र मंथन हुआ, तो उसमें से अमृत भी निकला और हलाहल विष भी। अमृत के लिए तो देवता और दानव दोनों लालायित थे, लेकिन विष पीने के लिए कोई तैयार न था। तब शिव आगे आए। उन्होंने विष को न तो उगला और न ही निगला, बल्कि उसे अपने कंठ में धारण कर लिया। यह घटना हमें जीवन का सबसे बड़ा पाठ पढ़ाती है। हमारे जीवन में भी सुख और दुःख, प्रशंसा और निंदा का मंथन चलता रहता है। हम सुख रूपी अमृत को तो जल्दी से पीना चाहते हैं, लेकिन दुःख और अपमान रूपी विष को देखकर भागते हैं। शिव बनना यानी उस विष को अपने भीतर उतारकर उसे स्वयं पर हावी न होने देना, बल्कि उसे अपने गले का आभूषण बना लेना। यह विष ही उन्हें ‘देवों के देव महादेव’ बनाता है। “जो स्वयं के लिए जीता है वह जीव है, लेकिन जो जगत के कल्याण के लिए विष पीता है, वह शिव है।” शिव ही मृत्युंजय हैं। मृत्यु का भय संसार का सबसे बड़ा भय है। हर जीव अपने प्राणों की रक्षा के लिए संघर्ष करता है, लेकिन शिव वह शाश्वत सत्य हैं जो मृत्यु से परे हैं।

वे ‘महाकाल’ हैं—समय के भी स्वामी। समय सब कुछ निगल जाता है, सब कुछ नष्ट कर देता है, लेकिन समय शिव को नहीं छू सकता, क्योंकि समय का जन्म ही शिव से हुआ है। श्मशान, जहाँ जीवन की सारी लीला समाप्त होती है, वह शिव का प्रिय निवास स्थान है। यह इस बात का प्रतीक है कि अंत ही वास्तव में एक नई शुरुआत है। भस्म रमाना हमें याद दिलाता है कि यह शरीर नश्वर है, एक दिन यह राख में बदल जाएगा। शिव उस राख को अपने शरीर पर लगाकर हमें मोह-माया से मुक्त होने का संदेश देते हैं। जब हम यह समझ लेते हैं कि हम यह शरीर नहीं, बल्कि वह अविनाशी चेतना हैं, तो हम भी मृत्युंजय हो जाते हैं। शिव की उपासना मृत्यु से बचने के लिए नहीं, बल्कि मृत्यु के भय को जीतने के लिए की जाती है। शिव का अर्धनारीश्वर रूप इस सृष्टि में संतुलन का प्रतीक है। पुरुष और प्रकृति, शिव और शक्ति, पदार्थ और ऊर्जा—ये दो नहीं, बल्कि एक ही सत्य के दो पहलू हैं। बिना शक्ति के शिव ‘शव’ हैं। यह स्वरूप हमें बताता है कि पूर्णता अकेलेपन में नहीं, बल्कि संतुलन में है। स्त्री और पुरुष का भेद केवल शारीरिक है, आत्मा के स्तर पर दोनों एक ही परम तत्व के अंश हैं। शिव करुणा हैं, तो शक्ति प्रेम है। शिव सत्य हैं, तो शक्ति सौंदर्य है।

जब ये दोनों मिलते हैं, तभी सृष्टि का चक्र चलता है। आज के समाज में जहाँ लिंग भेद की दीवारें खड़ी हैं, वहाँ शिव का अर्धनारीश्वर रूप समानता और सम्मान का सबसे बड़ा उद्घोष है। “शिव ही मैं हूँ, शिव ही तू है”—यह अद्वैत वेदांत का सार है। जब हम कहते हैं कि शिव ब्रह्मांड हैं और शिव ही आत्मा हैं, तो हम उस परम सत्य को स्वीकार करते हैं कि ईश्वर हमसे अलग कहीं सातवें आसमान पर नहीं बैठा है। वह हमारे भीतर ही है। जिस चेतना से मैं देख रहा हूँ, सुन रहा हूँ, और महसूस कर रहा हूँ, वह चेतना ही शिव है। जब मनुष्य अपने अहंकार की परतों को हटा देता है, जब वह ‘मेरा’ और ‘तेरा’ के भेद से ऊपर उठ जाता है, तो उसे हर कण में, हर क्षण में और हर जन में शिव के ही दर्शन होते हैं। एक भूखे को भोजन कराना शिव की पूजा है, किसी के आँसू पोंछना शिव का अभिषेक है। शिव अनादि हैं और अनंत हैं। उनका न कोई आरंभ है और न कोई अंत। वे स्वयंभू हैं—स्वयं से उत्पन्न। बाकी सभी देवी-देवताओं के जन्म की कथाएँ हैं, लेकिन शिव तो तब भी थे जब न समय था, न स्थान। वे उस निरंकार का साकार रूप हैं जिसे वेदों ने ‘नेति-नेति’ (यह भी नहीं, वह भी नहीं) कहकर पुकारा है। वे नियमों से बंधे नहीं हैं, वे उन्मुक्त हैं। उनके गण—भूत, प्रेत, पिशाच—इस बात का प्रमाण हैं कि शिव किसी को अस्वीकार नहीं करते। समाज जिसे ठुकरा देता है, जिसे अपवित्र मानता है, शिव उसे भी अपने पास स्थान देते हैं। उनकी बारात में देवता भी थे और दैत्य भी।

यह समावेशी दृष्टि ही शिव को ‘जगद्गुरु’ बनाती है। वे हमें सिखाते हैं कि पवित्रता वस्तुओं में नहीं, दृष्टि में होती है। यदि दृष्टि में शिव हैं, तो श्मशान की राख भी चंदन बन जाती है। ध्यान की अवस्था में बैठा योगी शिव है, और गृहस्थ जीवन में अपने परिवार का पालन करने वाला पिता भी शिव का ही रूप है। शिव वैरागी हैं, फिर भी सबसे आदर्श गृहस्थ हैं। उन्होंने सती के वियोग में प्रलयंकारी तांडव भी किया और पार्वती के प्रेम में जगत का कल्याण भी। वे भावनाओं से परे नहीं हैं, बल्कि वे भावनाओं की पराकाष्ठा हैं। उनका तीसरा नेत्र ज्ञान का नेत्र है। जब हम अपनी दो आँखों से संसार को देखते हैं, तो हम द्वैत देखते हैं—सुख-दुःख, अपना-पराया। लेकिन जब विवेक का तीसरा नेत्र खुलता है, तो काम (वासना) भस्म हो जाता है और सत्य प्रकट होता है।

शिव का तीसरा नेत्र खुलना विनाश का नहीं, बल्कि अज्ञान के नाश का संकेत है। अंततः, शिव को शब्दों में बाँधना सागर को लोटे में भरने जैसा है। शिव एक अनुभव हैं जो मौन में घटित होता है। वे वह शून्य हैं जहाँ से हम आए हैं, और वे वह अनंत हैं जहाँ हमें जाना है। जीवन की इस यात्रा में, जब हम भयभीत होते हैं, तो वे अभय हैं। जब हम अकेले होते हैं, तो वे संगी हैं। जब हम भटकते हैं, तो वे मार्ग हैं। शिव ही वह परम शांति हैं जिसकी तलाश हर आत्मा को है। अतः हे साधक, बाहर देखना बंद कर और अपने भीतर झाँक। अपनी श्वासों के आवागमन को देख—जो श्वास भीतर जा रही है वह ‘सो’ है, और जो बाहर आ रही है वह ‘हम’ है। यह ‘सोहम’ ही शिव का मंत्र है। तू शरीर नहीं, तू मन नहीं, तू बुद्धि नहीं। तू वही चिदानंद रूप शिव है। “शिवोहम! शिवोहम!”। यह उद्घोष केवल वाणी का नहीं, बल्कि अनुभूति का होना चाहिए। जिस क्षण यह अनुभूति हो गई कि जो शून्य है, जो अनंत है, जो आदि है और जो अंत है, वह और कोई नहीं, मेरा ही विशुद्ध स्वरूप है, उसी क्षण जीवन का उद्देश्य पूर्ण हो जाता है। यही शिव तत्व है, यही सत्य है, यही सुंदर है, और इसलिए ‘सत्यम शिवम सुन्दरम’।

Related Articles

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *

Back to top button