केंद्रीय बजट 2026-27 में सशस्त्र बलों के विकलांग पेंशन पर कर छूट सीमित करने का प्रस्ताव: पूर्व सैनिकों में आक्रोश

पटना। वित्त मंत्री निर्मला सीतारमण द्वारा 1 फरवरी 2026 को प्रस्तुत केंद्रीय बजट 2026-27 में आयकर अधिनियम में संशोधन का प्रस्ताव किया गया है, जिसके तहत सशस्त्र बलों के कर्मियों को मिलने वाली विकलांग पेंशन पर पूर्ण कर छूट अब केवल उन मामलों तक सीमित रहेगी, जहां कर्मी को सेवा से संबंधित शारीरिक विकलांगता के कारण “इनवैलिडेड आउट” (सेवा से चिकित्सकीय आधार पर निकाला गया) किया गया हो।
यह छूट सेवा तत्व (सामान्य पेंशन के समान) और विकलांगता तत्व (सेवा से जुड़ी चोट या बीमारी के लिए मुआवजा) दोनों पर लागू होगी, लेकिन सुपरन्यूमरेशन (सेवानिवृत्ति) या अन्य कारणों से सेवानिवृत्त होने वालों को इससे बाहर रखा जाएगा। यह बदलाव 1 अप्रैल 2026 से प्रभावी होगा, अर्थात वित्तीय वर्ष 2026-27 और उसके बाद के वर्षों के लिए।
सशस्त्र बलों की विकलांग पेंशन पर पूर्ण कर छूट 1970 के आसपास औपचारिक रूप से मान्यता प्राप्त हुई थी, जो 1922 के ब्रिटिश कालीन पत्र की व्याख्या पर आधारित थी। यह नीति सेवा से जुड़े बलिदानों का सम्मान करने के लिए दोनों तत्वों को गैर-कर योग्य मानती थी।
2019 में सीबीडीटी ने सर्कुलर नंबर 13/2019 जारी कर छूट को केवल “इनवैलिडेड आउट” मामलों तक सीमित करने का प्रयास किया, जिससे पूर्व सैनिकों में भारी विरोध हुआ। यह उन सैनिकों के साथ अन्याय है जो चोट के बावजूद सेवा जारी रखकर अपनी दृढ़ता दिखाते हैं।
मामला सुप्रीम कोर्ट पहुंचा, जहां अगस्त 2019 में कर्नल प्रदीप माथुर एवं अन्य बनाम भारत संघ जैसे मामलों में “स्टेटस क्वो” आदेश जारी कर सर्कुलर पर रोक लगा दी गई और पूर्ण छूट बरकरार रखी गई। 2020 में पीसीडीए द्वारा कर कटौती का आदेश भी रक्षा मंत्रालय ने सुप्रीम कोर्ट के स्टे के कारण वापस ले लिया।
नवंबर 2025 में गुजरात हाई कोर्ट ने भी स्वैच्छिक सेवानिवृत्ति वाले सेवा-संबंधित विकलांग सैनिकों को पूर्ण छूट की पुष्टि की, सुप्रीम कोर्ट के स्टे और पुराने सीबीडीटी सर्कुलर (जैसे 2/2001) का हवाला देते हुए।
2026 बजट में बदलाव की आलोचना
यह प्रस्ताव विधायी संशोधन के माध्यम से 2019 के सर्कुलर को पुनर्जीवित करता है, जो चल रही सुप्रीम कोर्ट की सुनवाई को दरकिनार करने का प्रयास है।
यह भाजपा सरकार द्वारा सशस्त्र बलों को 50 वर्ष पुरानी लाभ को कमजोर करने का कदम है। सवाल हैं कि 1970 की व्याख्या अब “गलत” क्यों मानी जा रही है, जबकि सुप्रीम कोर्ट का अंतरिम संरक्षण जारी है।
नेशनल एक्सर्विसमैन को-ऑर्डिनेशन कमिटी, (रजि.), बिहार के महासचिव एयर वेटरन इंग्लेश रंजन सहित पूर्व सैनिक समूहों ने इस बदलाव को भेदभावपूर्ण बताया है।
उनका कहना है कि यह सेवा से जुड़ी चोट वाले सैनिकों में “दो वर्ग” पैदा करता है—एक को पूर्ण राहत मिलती है, दूसरे को नहीं। वे जोर देते हैं कि चोट के बावजूद सेवा जारी रखना प्रतिबद्धता दर्शाता है, न कि दंड का कारण। कई मामलों में सैनिकों को रक्षा बलों की जनशक्ति आवश्यकताओं के कारण सेवा में रखा जाता है, न कि उनकी व्यक्तिगत इच्छा से।
पूर्व सैनिकों और उनके परिवारों में व्यापक विरोध है, जो इसे राष्ट्र की रक्षा करने वालों के खिलाफ सरकार का रुख मानते हैं।
अमेरिका, ब्रिटेन, कनाडा और ऑस्ट्रेलिया जैसे कई देश सेवा से जुड़े बलिदानों को मान्यता देते हुए सैनिक विकलांग पेंशन पर पूर्ण कर छूट या अनुकूल कर व्यवस्था प्रदान करते हैं। इन देशों में छूट विकलांगता के स्रोत पर आधारित होती है, न कि सेवा जारी रखने या न रखने पर। अमेरिका में VA विकलांग मुआवजा पूरी तरह कर-मुक्त है, ब्रिटेन में वॉर पेंशन स्कीम टैक्स-फ्री है, कनाडा में VAC लाभ कर-मुक्त हैं, और ऑस्ट्रेलिया में डिसेबिलिटी कम्पेंसेशन पेमेंट टैक्स-एक्जेम्प्ट हैं।
यह बदलाव समानता के वैश्विक मानकों से विपरीत लगता है और नए कानूनी चुनौतियों को जन्म दे सकता है। सरकार और विपक्ष से हम सैनिकों का अनुरोध है कि सैनिक विरोधी इस टैक्स बिल को वापस ले हम सैनिकों कि दी जा रही हक जारी रखें।



