निजी हाथों में जाने वाले हैं बिहार के ज्यादातर सरकारी मेडिकल कॉलेज : डॉ. अजय

उदाकिशुनगंज/मधेपुरा (संजीव कश्यप) : विधान परिषद सदस्य डॉ. अजय कुमार सिंह ने बड़ा आरोप लगाते हुए कहा है कि बिहार सरकार राज्य के अधिकांश सरकारी मेडिकल कॉलेजों का प्रबंधन निजी हाथों में सौंपने की तैयारी कर रही है। उन्होंने कहा कि यह कदम जनहित के विपरीत है और इससे गरीबों की स्वास्थ्य सेवाओं पर गंभीर असर पड़ सकता है।
डॉ. अजय ने जानकारी देते हुए बताया कि सरकार ने 33 मेडिकल कॉलेजों को पीपीपी (Public Private Partnership) मोड पर चलाने के लिए निजी कंपनियों से प्रस्ताव आमंत्रित किए हैं। इस पर 17 जून को कंसल्टेशन भी प्रस्तावित है। उन्होंने कहा कि पूर्व में स्वास्थ्य सचिव के हवाले से भी इस संबंध में जानकारी प्रकाशित हो चुकी है।
उन्होंने बताया कि इन 33 मेडिकल कॉलेजों में 17 नए और 16 ब्राउनफील्ड प्रोजेक्ट शामिल हैं। ब्राउनफील्ड से आशय उन कॉलेजों से है जो या तो पहले से संचालित हैं या निर्माणाधीन हैं। वर्तमान में राज्य में 12 सरकारी मेडिकल कॉलेज हैं, जिनमें से 8 निर्माणाधीन हैं। सरकार की योजना के अनुसार 20 में से लगभग 16 कॉलेज निजी हाथों में जा सकते हैं, जबकि केवल चार संस्थान—IGIMS, AIIMS, PMCH और NMCH—सरकारी नियंत्रण में रह सकते हैं।
डॉ. अजय कुमार सिंह ने कहा कि बिहार के सरकारी मेडिकल कॉलेज गरीबों के इलाज की रीढ़ हैं। यदि SKMCH, JLNCH भागलपुर और अनुग्रह नारायण मेडिकल कॉलेज जैसे संस्थान निजी प्रबंधन में चले जाते हैं, तो इसका सीधा असर आम जनता पर पड़ेगा। उन्होंने आशंका जताई कि निजीकरण के बाद फीस निर्धारण भी निजी संचालकों के हाथ में चला जाएगा, जिससे इलाज महंगा हो सकता है। हालांकि सरकार द्वारा गरीबों के लिए सब्सिडी देने की बात कही जा रही है, लेकिन प्रक्रिया जटिल हो सकती है।
उन्होंने उदाहरण देते हुए कहा कि सरकार पहले ही जयप्रभा अस्पताल को मेदांता समूह को सौंप चुकी है, जहां गरीब मरीजों के लिए बेड आरक्षित तो हैं, लेकिन व्यवस्था जटिल होने के कारण लाभ सीमित है।
डॉ. अजय ने आरोप लगाया कि सरकार यह निर्णय चुपचाप तरीके से ले रही है, जो पूरी तरह जनविरोधी है। इसके अलावा उन्होंने यह भी बताया कि 17 ग्रीनफील्ड मेडिकल कॉलेजों के लिए सरकार 60 वर्षों की लीज पर जमीन निजी संस्थानों को देने की योजना पर काम कर रही है।
उन्होंने सरकार से इस फैसले पर पुनर्विचार करने की मांग की और कहा कि बिहार में पहले से ही स्वास्थ्य सेवाएं कमजोर हैं, ऐसे में निजीकरण से स्थिति और गंभीर हो जाएगी।



