नीतीश युग के बाद – लव-कुश समीकरण का असली वारिस कौन?
सामाजिक राजनीतिक का धुरी बना लव कुश समीकरण


1990 में लालू प्रसाद जब जनता दल की अगुवाई में मुख्यमंत्री बने, तो उनके साथ नीतीश कुमार, रामविलास पासवान और शरद यादव जैसे नेता कंधे से कंधा मिलाकर खड़े थे। मगर सत्ता के कुछ ही वर्षों में पिछड़ी जातियों को लगने लगा कि शासन-प्रशासन से लेकर उच्च पदों तक एक खास जाति का वर्चस्व हो गया है। उनकी राजनीति हाशिये पर चली गई।
इसी बेचैनी से जन्म हुआ “कुर्मी चेतना रैली” का। पटना के गांधी मैदान से उठी आवाज ने 1994 में एक नई पार्टी को आकार दिया – समता पार्टी। जॉर्ज फर्नांडीज, नीतीश कुमार और शकुनी चौधरी इसके शिल्पकार बने। लालू के “MY समीकरण” – मुस्लिम-यादव – के जवाब में “लव-कुश समीकरण” गढ़ा गया। कुर्मी और कोइरी-कुशवाहा को एक मंच पर लाया गया।
1995 का सबक
समता पार्टी ने 324 में से 310 सीटों पर ताल ठोकी। नीतीश कुमार CM चेहरा थे। नतीजा? सिर्फ 7 सीटें। उनमें भी 5 विधायक लव-कुश समाज से। संदेश साफ था: समीकरण बना है, पर जमीन पर उतरना बाकी है।
आगे चलकर समता पार्टी भाजपा के साथ आई। NDA के बैनर तले लव-कुश समीकरण ने राजद को पहली बार असली चुनौती दी। 24 नवंबर 2005 को नीतीश कुमार मुख्यमंत्री बने और 14 अप्रैल 2026 तक, दो दशक बिहार की सत्ता के केंद्र में रहे। इस दौरान उन्होंने सिर्फ सड़क-बिजली नहीं बनाई, एक “नया वोटर” भी तैयार किया – विकास चाहने वाला, जाति से आगे सोचने वाला।
15 अप्रैल 2026: सत्ता का हस्तांतरण
नीतीश ने मुख्यमंत्री की कुर्सी सम्राट चौधरी को सौंप दी। बस, यहीं से सवाल उठा: लव-कुश समीकरण का नेता अब कौन?
ताकत का गणित 2025
बिहार विधानसभा 2025 के आंकड़े देखें तो तस्वीर साफ होती है। कुशवाहा समाज के 24 विधायक हैं – जदयू 11, भाजपा 5, रालोमो 2, लोजपा-रा 1, राजद 2, सीपीएम 1, माले 1। कुर्मी समाज के 14 विधायक – जदयू 12, भाजपा 2।
यानी कुर्मी अभी भी जदयू को अपना घर मानता है। कुशवाहा वोट बंटा हुआ है, पर पलड़ा NDA की तरफ भारी है। जदयू संगठन पर नजर डालें तो राष्ट्रीय अध्यक्ष नीतीश कुमार, प्रदेश अध्यक्ष उमेश कुशवाहा और विधायक दल के नेता श्रवण कुमार – तीनों लव-कुश पृष्ठभूमि से।
4 दावेदार, 1 विरासत
1. नीतीश कुमार :विरासत का चेहरा
20 साल की विकास यात्रा ने नीतीश को ब्रांड बना दिया। अति पिछड़ी जातियां भी लव कुश के साथ आ गई। क्योंकि नीतीश ने उन्हें हिस्सेदारी दी। भले मुख्यमंत्री ना हो जदयू का कैडर आज भी नीतीश को नेता मानता है!उनके विकास यात्रा को दिल में रखे हुए हैं।
2. सम्राट चौधरी: सत्ता का चेहरा
भाजपा ने उन्हें दूरदर्शी राजनीती के तहत ओबीसी का बडा चेहरा बनाया। प्रदेश अध्यक्ष, प्रतिपक्ष नेता, उपमुख्यमंत्री से मुख्यमंत्री तक का सफर 8 साल में तय किया। वरिष्ठ पत्रकार भवेश मंडल कहते हैं, “जो सत्ता की कुर्सी पर रहेगा, लव-कुश का नेता वही माना जाएगा।” भाजपा की रणनीति साफ है – सम्राट के जरिए समाजवादी और वाम खेमे के पिछड़े वोटर को अपने पाले में लाना। भाजपा ने सम्राट को मुख्यमंत्री बनाकर साफ कर दिया की उधार के चेहरे पर नहीं चलेगी।
3. उपेन्द्र कुशवाहा: जमीन का चेहरा
समता पार्टी के संस्थापक सदस्य, राष्ट्रीय लोक मोर्चा के अध्यक्ष और राज्यसभा सांसद। उनके पास 4 विधायक हैं। उनकी कोशिश जदयू जैसा ठोस कुशवाहा वोट बैंक बनाने की है। समाज में उनकी व्यक्तिगत पकड़ मजबूत है। वे किंगमेकर की भूमिका में आ सकते हैं।
4. निशांत कुमार :वाइल्ड कार्ड एंट्री
युवा चेहरा, कुर्मी समाज का उनसे भावनात्मक संबंध है। निशांत राजनीती मे आने से जदयू कैडर का एक घर का चेहरा मिल जाएगा!राजनीति में नए हैं, इसलिए एंटी इनकंबेंसी नहीं है। अपने पिता नीतीश के तरह साफ छवि का फायदा मिलेगा। नीतीश ने जो नया वोटर तैयार किया विकास चाहने वाले उसमें निशांत फिट बैठते हैं। इनका कमजोर पक्ष जीरो ग्राउंड एक्सपीरियंस है। अभी इनकी राजनीति की शुरुआत है।
वरिष्ठ पत्रकार भवेश मंडल सही कहते हैं – “जो कुर्सी पर रहेगा, लव-कुश का नेता वही माना जाएगा” 15 अप्रैल 2026 के बाद लव-कुश समीकरण की सत्ता वाली कमान सम्राट चौधरी के हाथ है। भावनात्मक कमान अब भी नीतीश कुमार के पास है।लव-कुश अब सिर्फ कुर्मी-कुशवाहा तक सीमित नहीं रहा। दांगी, धानुक, गंगोत जैसी दर्जनों पिछड़ी जातियां इसमें समा चुकी हैं। इस समीकरण को 20 साल तक साधे रखना नीतीश कुमार के बस की बात थी।
सम्राट चौधरी के सामने चुनौती दोहरी है: नीतीश जितना स्वीकार्य बनना, और भाजपा को उतना ही विस्तार देना। अगर कर पाए तो लव-कुश नए के शिल्पकार कहलाएंगे। फिलहाल लव-कुश की चाबी नीतीश ने सम्राट को सौंप दी है। ताला खुलेगा या नहीं, गेंद अब सम्राट के पाले में है।



