कार्यस्थलों पर सुरक्षा को बढ़ावा देने के लिए पूरे देश में राष्ट्रीय सुरक्षा दिवस मनाया जाता है : डॉ. प्रदीप सिंह देव

राष्ट्रीय सुरक्षा दिवस
देवघर। राष्ट्रीय सुरक्षा दिवस भारत में प्रति वर्ष 4 मार्च को मनाया जाता है। इसी दिन से ही एक सप्ताह तक चलने वाला सुरक्षा अभियान भी शुरू हो जाता है। कार्यस्थलों पर सुरक्षा को बढ़ावा देने के लिए पूरे देश में राष्ट्रीय सुरक्षा दिवस मनाया जाता है। मौके पर स्थानीय विवेकानंद शैक्षणिक, सांस्कृक्तिक एवं क्रीड़ा संस्थान के केंद्रीय अध्यक्ष डॉ. प्रदीप कुमार सिंह देव ने कहा- 4 मार्च, 1966 को राष्ट्रीय सुरक्षा परिषद की स्थापना हुई थी और इस अवसर पर तत्कालीन राष्ट्रपति डॉ. सर्वपल्ली राधाकृष्णन ने औद्योगिक सुरक्षा के लिए व्यापक चेतना जगाने का उद्घोष किया था। उन्होंने औद्योगिक सुरक्षा को एक नई दिशा दी जिसमें यह स्पष्ट हुआ कि सुरक्षा प्रबंधन की जिम्मेदारी तो है, लेकिन उसमें सबका सम्मिलित सहयोग चाहिये। बीसवीं सदी में इसके निवारण के लिए सरकार ने कानून बनाए। भारत में 1948 में कारखाना अधिनियम बना। क्रमशः 1976 तथा 1987 में इसमें अनेक धाराएँ जोड़ी गई।
इस कानूनी प्रावधान से कारखाने के अंदर हमारे कार्य व्यवहार में परिवर्तन हुआ। साथ ही परिस्थितियों में परिवर्तन प्रारम्भहुआ, लेकिन यह तो न्यूनतम आवशयकता है। मात्र कानून से बच जाना ही पर्याप्त नहीं कुछ और करना ही होगा। इसके पश्चात सुरक्षा अभियंत्रण पर विचार किया गया और ऐसे तकनीक प्रावधानों पर सोचा गया जो व्यक्ति की गलती को रोकें और दुर्घटनासे बचाएँ। चलती हुई मशीनों में गार्ड की व्यवस्था, चलते हुए उपकरणों में इण्टरलॉक, इन्हें खास परिस्थिति में स्वतः बंद होने के प्रावधान किये गये और डिजाइन स्तर से ही तकनीकी उपायों को सम्मिलित करने पर बल दिया गया जो प्रविधि को सुरक्षित बना दें। इससे भी समस्या का आंशिक निदान ही सम्भव था, इसके पश्चात् खतरों से आगाह रखने एवं उनके लिए पर्याप्त जागरूकता पैदा करने के उद्देश्य से कानून संशोधन किया गया और संयंत्र के प्रभारी के लिए यह आवशयक कर दिया गया कि अपने कर्मचारियों का सुरक्षा प्रशिक्षण अत्यंत आवश्यक है।
यह हमारी वैधानिक एवं नैतिक जिम्मेदारी है। आजकल हर स्तर के कर्मचारी के लिए आवश्यकतानुसार सुरक्षा प्रशिक्षण की व्यवस्था की जाती है। प्रशिक्षण के माध्यम से काम की जानकारी देना, सुरक्षा के प्रति जागरुकता पैदा करना और कर्मचारियों के चिंतन और व्यवहार में परिवर्तन लाना यह एक कठिन कार्य है। भले ही उन्हें जानकारी मिल जाती है, लेकिन मनोवृत्ति में परिवर्तन उतना आसान नहीं। इसलिये प्रशिक्षण वा शिक्षा एक सतत प्रक्रिया है। इसे निरंतर चलाते रहना होगा। लेकिन त्रुटि करने की प्रवृत्ति मानसमें बनी रहती है। कारण यह है कि परिस्थितियाँ एवं पूर्व संचित संस्कारकर्मचारी को प्रभावित करते रहते हैं। इन संस्कारों को पूर्णतः प्रभावित करना एक कठिन कार्य है। इसीलिए यह आवश्यक समझा गया है कि प्रणाली का विकास किया जाए जिसके तहत न केवल तकनीकी बल्कि प्रशासनिक नियंत्रण को कारगर बनाया जाए।
आज आवशयकता है सुरक्षा प्रबंधन प्रणाली की जिसके तहत कुछ बातों पर बल दिया जाता है जिसकी चर्चा आवश्यक है। पहली बात है सुरक्षा एवं स्वास्थ्य नीति, जिसे निश्चित करना एवं जारी करना आवश्यक है। यह संस्थान की मान्यता एवं मूल्यों की अवधारणा का संकेत है। इस नीति से ही स्पष्ट होनी चाहिए कि प्रबंधन कर्मचारियों के प्रति कितनी सचेष्ट है। इसका प्रभाव प्रत्येक कर्मचारी पर पड़ता है। इसके साथ ही हर वर्ष की सुरक्षा कार्य योजना होनी चाहिए, जिसके अंतर्गत आर्थिक प्रावधान के साथ ही खतरों के आकलन एवं निवारण की योजना, गृहव्यवस्था एवं आकस्मिक स्थिति निपटने का पूरा प्रावधान होना आवश्यक है। सबसे आवश्यक है यह मान्यता कि सुरक्षा न केवल प्रबंधन की जिम्मेदारी है, बल्कि यह प्रत्येक कर्मचारी की जिम्मेदारी है। सभी इसमें सक्रिय रूप से सहायता करें और अपनी, कर्मचारियों की तथा उपकरणों की सुरक्षा को आश्वस्त करे। स्मरण रहे कि सुरक्षा उत्पादकता बढ़ाती है, लाभ अर्जन में सहायक है।



